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बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रही महिला डॉक्टर को मिलेगा मातृत्व लाभ

Vivek G.
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धनश्री रमेश कारखानिस बनाम ग्रेटर मुंबई नगर निगम, बॉम्बे हाईकोर्ट ने कॉन्ट्रैक्ट महिला डॉक्टर को मातृत्व लाभ देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा, कानून संविदा कर्मचारियों में भेद नहीं करता।

बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रही महिला डॉक्टर को मिलेगा मातृत्व लाभ

मुंबई में कार्यरत एक संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) महिला डॉक्टर को मातृत्व लाभ से वंचित करने के फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 का फायदा केवल स्थायी कर्मचारियों तक सीमित नहीं है।

यह मामला डॉ. धनश्री रमेश करखनिस बनाम बृहन्मुंबई महानगरपालिका से जुड़ा है, जिसमें अदालत ने महिला डॉक्टर के पक्ष में अहम आदेश दिया।

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मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता डॉ. धनश्री करखनिस, जो के.ई.एम. अस्पताल और सेठ जी.एस. मेडिकल कॉलेज में एनेस्थीसिया विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में संविदा पर कार्यरत थीं, ने अगस्त 2024 में मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया।

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उनकी सेवा समय-समय पर संविदा के आधार पर बढ़ाई जाती रही। 7 नवंबर 2024 को उन्होंने बच्चे को जन्म दिया।

अस्पताल प्रशासन ने 21 अक्टूबर 2024 को एक पत्र जारी कर उनका मातृत्व लाभ का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि संविदा कर्मचारियों को ऐसे लाभ नहीं दिए जाते। इसी पत्र को उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत में कहा कि उन्होंने मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 5(2) के तहत 80 दिन की अनिवार्य सेवा पूरी कर ली थी, जो कानून में पात्रता की शर्त है।

अदालत को बताया गया कि उन्होंने समय-समय पर अपनी गर्भावस्था की जानकारी दी और आवश्यक दस्तावेज भी जमा किए।

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वकील ने जोर देकर कहा, “किसी भी अनुबंध की शर्त कानून से ऊपर नहीं हो सकती। धारा 27 स्पष्ट कहती है कि यदि कोई अनुबंध कानून के खिलाफ है, तो वह मान्य नहीं होगा।”

बृहन्मुंबई महानगरपालिका की ओर से कहा गया कि डॉक्टर की नियुक्ति अस्थायी और स्टॉप-गैप व्यवस्था के तहत थी। उन्हें नियमित कर्मचारियों जैसी सुविधाएं नहीं मिल सकतीं।

यह भी तर्क दिया गया कि अनुबंध में स्पष्ट था कि वे सेवा नियमों के लाभ की पात्र नहीं होंगी।

अदालत की टिप्पणी

खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान सुरक्षा देना है।

अदालत ने कहा, “कानून कहीं भी संविदा और स्थायी कर्मचारी के बीच भेद नहीं करता। पात्रता केवल धारा 5 में दी गई शर्तों पर निर्भर है।”

पीठ ने यह भी कहा कि धारा 27 के अनुसार, कोई भी सेवा अनुबंध कानून के प्रावधानों को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।

न्यायालय ने निगम के उस रुख पर भी नाराजगी जताई, जिसमें पहले लाभ देने की सहमति जताई गई थी और बाद में पलट गया गया।

पीठ ने टिप्पणी की, “मातृत्व लाभ महिला के गरिमापूर्ण जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है।”

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अदालत का निर्णय

अदालत ने 21 अक्टूबर 2024 के पत्र को रद्द करते हुए आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के तहत सभी लाभ दिए जाएं।

कोर्ट ने निगम को निर्देश दिया कि छह सप्ताह के भीतर भुगतान और लाभ सुनिश्चित किए जाएं।

याचिका स्वीकार करते हुए अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि संविदा कर्मचारी होने के आधार पर मातृत्व लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।

Case Title: Dhanashri Ramesh Karkhanis vs Municipal Corporation of Greater Mumbai

Case No.: Writ Petition No. 483 of 2025

Decision Date: 27 February 2026

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