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व्यापारिक लेनदेन को आपराधिक रंग नहीं दे सकते: कलकत्ता हाईकोर्ट ने 40 लाख धोखाधड़ी केस किया खारिज

Vivek G.
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प्रद्युत सामंत बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य, कलकत्ता हाईकोर्ट ने 40 लाख रुपये की कथित धोखाधड़ी मामले में कहा कि व्यापारिक बकाया को आपराधिक केस नहीं बनाया जा सकता, कार्यवाही रद्द।

व्यापारिक लेनदेन को आपराधिक रंग नहीं दे सकते: कलकत्ता हाईकोर्ट ने 40 लाख धोखाधड़ी केस किया खारिज

कोलकाता हाईकोर्ट की एक अहम सुनवाई में व्यापारिक विवाद और आपराधिक मुकदमे के बीच की रेखा साफ दिखाई दी। बुधवार को अदालत कक्ष में सन्नाटा था जब जस्टिस अजय कुमार गुप्ता ने साफ शब्दों में कहा कि केवल बकाया रकम के आधार पर किसी को धोखाधड़ी का आरोपी नहीं बनाया जा सकता।

यह मामला Pradyut Samanta बनाम State of West Bengal & Another से जुड़ा था, जिसमें याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी ।

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मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता प्रद्युत सामंता एक छोटे व्यापारी हैं, जो “लोकनाथ फीड सेंटर” के नाम से पोल्ट्री फीड का कारोबार चलाते हैं। उनका व्यवसाय ग्राम पंचायत में पंजीकृत है।

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साल 2012 से वह एक सप्लायर से मुर्गी दाना खरीद रहे थे। दोनों के बीच लंबे समय तक नियमित व्यापारिक संबंध रहे। सप्लायर उधार पर माल देता था और भुगतान नकद, चेक या बैंक ट्रांसफर से होता था।

अप्रैल 2013 से मार्च 2014 के बीच करीब 1.02 करोड़ रुपये का लेनदेन हुआ। याचिकाकर्ता ने लगभग 75 लाख रुपये चुका दिए थे। बाद में सप्लायर ने 3% की छूट भी दी, जिससे यह संकेत मिलता है कि खाते को स्वीकार किया गया था।

फिर अचानक नवंबर 2016 में पुलिस ने रात में याचिकाकर्ता को घर से उठा लिया। आरोप था कि 40 लाख रुपये एक साल से अधिक समय से बकाया हैं और उन्होंने धोखाधड़ी की है। अरामबाग थाने में IPC की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) और 420 (धोखाधड़ी) के तहत मामला दर्ज हुआ। चार्जशीट भी दाखिल कर दी गई।

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याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में कहा, “यह पूरा विवाद व्यापारिक है। यदि कोई बकाया है भी, तो उसका उपाय सिविल कोर्ट में है, न कि आपराधिक मुकदमा।”

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि अनुबंध के उल्लंघन (contract breach) को धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता, जब तक शुरू से ही धोखा देने की नीयत साबित न हो।

वकील ने कहा, “मेरे मुवक्किल ने नियमित भुगतान किया है। आखिरी भुगतान जुलाई 2016 में हुआ। यह साबित करता है कि संबंध टूटे नहीं थे।”

राज्य की ओर से दलील दी गई कि कुछ रकम बकाया थी और आश्वासन के बावजूद भुगतान नहीं किया गया। इसलिए prima facie (पहली नजर में) अपराध बनता है।

सरकारी वकील ने कहा कि जांच में पर्याप्त सामग्री मिली है और मुकदमे को जारी रहने देना चाहिए।

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अदालत की टिप्पणी

जस्टिस गुप्ता ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण सवाल उठाए-क्या शुरुआत से ही धोखा देने की नीयत थी?

फैसले में अदालत ने साफ कहा, “धोखाधड़ी साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि शुरुआत में ही बेईमानी की मंशा थी। केवल बाद में भुगतान न करना अपराध नहीं बनता।”

अदालत ने पाया कि शिकायत में कहीं भी यह आरोप नहीं है कि सप्लाई के समय याचिकाकर्ता ने झूठा वादा किया या जानबूझकर धोखा दिया।

पीठ ने कहा, “लंबे समय तक व्यापारिक संबंध रहे, भुगतान होते रहे। केवल बकाया रकम को आपराधिक रंग देना कानून का दुरुपयोग होगा।”

न्यायालय ने यह भी दोहराया कि “सिविल विवाद को आपराधिक मुकदमे में बदलना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”

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अंतिम फैसला

सभी तथ्यों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि IPC की धारा 406 और 420 के आवश्यक तत्व इस मामले में मौजूद नहीं हैं।

अदालत ने कहा कि यह विवाद पूरी तरह सिविल प्रकृति का है और आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्याय के हित में नहीं होगा।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने अरामबाग थाना केस नंबर 1066/2016 और उससे जुड़ी कार्यवाही को याचिकाकर्ता के खिलाफ रद्द कर दिया।

Case Title: Pradyut Samanta vs The State of West Bengal & Another

Case No.: C.R.R. 933 of 2017

Decision Date: 11 February 2026

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