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कलकत्ता हाई कोर्ट ने नाबालिग अपहरण मामले में दोषसिद्धि रद्द की, कहा- अभियोजन आरोप साबित करने में विफल

Shivam
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कलकत्ता उच्च न्यायालय ने नाबालिग अपहरण मामले में आरोपी को बरी किया, कहा अभियोजन वैध अभिभावक से जबरन ले जाने का आरोप साबित नहीं कर सका। - एस.के. समद बनाम पश्चिम बंगाल राज्य

कलकत्ता हाई कोर्ट ने नाबालिग अपहरण मामले में दोषसिद्धि रद्द की, कहा- अभियोजन आरोप साबित करने में विफल

कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में नाबालिग लड़की के कथित अपहरण के मामले में आरोपी की सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि लड़की को किसी वैध अभिभावक की कस्टडी से जबरन ले जाया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला नवंबर 2003 का है, जब पुलिस ने कोलकाता के एक रेड लाइट इलाके से एक नाबालिग लड़की को बरामद करने का दावा किया था। आरोप था कि आरोपी स्क. समद उसे कपड़े खरीदने के बहाने वहां ले गया।

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ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 363 (अपहरण) के तहत दोषी ठहराते हुए चार साल की सजा सुनाई थी। हालांकि, धारा 373 (नाबालिग की बिक्री) के आरोप में उसे सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था।

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अपील की सुनवाई करते हुए जस्टिस चैताली चटर्जी दास ने मामले के सभी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का विस्तार से परीक्षण किया।

कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के बयान में कई विरोधाभास हैं, खासकर इस बात को लेकर कि वह जिस महिला के साथ रह रही थी, क्या वह वास्तव में उसकी वैध अभिभावक थी या नहीं।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी पीड़िता के लिए पूरी तरह अजनबी नहीं था और वह उसके साथ बिना किसी विरोध के गई थी।

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कोर्ट ने कहा,

“अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि पीड़िता को वैध अभिभावक की कस्टडी से ले जाया गया था।”

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपहरण के मामले में दोषसिद्धि के लिए दो बातें साबित होना जरूरी है:

• पीड़िता किसी वैध अभिभावक की कस्टडी में थी

• उसे बिना अनुमति वहां से ले जाया गया

इस मामले में कोर्ट को दोनों ही तत्व साबित नहीं मिले।

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साथ ही, कोर्ट ने यह भी पाया कि आरोपी द्वारा लड़की को बेचने के इरादे का कोई ठोस सबूत नहीं था। जांच में भी कई खामियां सामने आईं, जैसे पर्याप्त स्वतंत्र गवाहों का अभाव और जरूरी दस्तावेजों की कमी।

हाई कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने आदेश दिया, “दोषसिद्धि और सजा का आदेश निरस्त किया जाता है,” और आरोपी को जमानत बांड से मुक्त करने का निर्देश दिया।

Case Title: Sk. Samad vs State of West Bengal

Case Number: CRA 377 of 2007

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