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दहेज उत्पीड़न व आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने पति की सजा रद्द की

Vivek G.
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पूर्ण चंद्र राउल और अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, कलकत्ता हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में पति की सजा रद्द की, कहा अभियोजन के आरोप अस्पष्ट और अविश्वसनीय।

दहेज उत्पीड़न व आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने पति की सजा रद्द की

कलकत्ता हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने के एक पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा और गवाहों की गवाही भरोसेमंद नहीं पाई गई।

यह फैसला न्यायमूर्ति प्रसेंजीत बिस्वास की एकल पीठ ने सुनाया। मामला वर्ष 1987 की एक कथित दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या से जुड़ा था।

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मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन के अनुसार, मृतका की शादी अपीलकर्ता पूर्ण चंद्र राउल से हुई थी। आरोप था कि विवाह के समय नकद राशि, आभूषण और अन्य सामान दहेज के रूप में दिया गया। कुछ समय बाद पति और उसके परिवार की ओर से और पैसे लाने का दबाव बनाया जाने लगा।

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मृतका के भाई ने शिकायत में कहा कि अतिरिक्त पैसे की मांग पूरी न होने पर उसके साथ मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की जाती थी। बताया गया कि लगातार प्रताड़ना से परेशान होकर महिला ने 31 जुलाई 1987 को आत्महत्या कर ली। बाद में उसके भाई ने अदालत के माध्यम से शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की।

ट्रायल कोर्ट ने पति और उसकी मां को भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (क्रूरता) और 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई।

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बचाव पक्ष की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट का फैसला कमजोर और विरोधाभासी साक्ष्यों पर आधारित है। बचाव पक्ष ने कहा कि मुख्य गवाह मृतका के करीबी रिश्तेदार थे और उनकी गवाही स्वतंत्र या निष्पक्ष नहीं मानी जा सकती।

वकील ने यह भी तर्क दिया कि जांच के दौरान इन गवाहों ने पुलिस को प्रताड़ना या दहेज मांग से संबंधित कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया था। इसलिए अदालत में दिए गए उनके बयान बाद में जोड़े गए प्रतीत होते हैं।

इसके अलावा शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी को भी बचाव पक्ष ने संदेह पैदा करने वाला बताया।

अदालत की मुख्य टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों की विस्तृत जांच करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष की कहानी कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर कमजोर है।

अदालत ने कहा कि मृतका के भाई और माता-पिता ने प्रताड़ना के आरोप लगाए, लेकिन उन्होंने अपने बयान में घटनाओं की स्पष्ट तारीख, स्थान या विवरण नहीं दिया।

पीठ ने कहा:“अभियोजन के आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं। इनमें दहेज मांग या क्रूरता की ठोस घटनाओं का उल्लेख नहीं है।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जिन गवाहों ने प्रताड़ना के बारे में बताया, उन्होंने जांच के दौरान पुलिस को ऐसे आरोप नहीं बताए थे।

अदालत ने कहा:“जब महत्वपूर्ण तथ्य जांच के समय नहीं बताए गए और पहली बार अदालत में सामने आए, तो ऐसे बयानों पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता।”

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चिकित्सा साक्ष्य पर भी सवाल

मामले में पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने कहा था कि मौत फांसी के कारण हुई और संभवतः आत्महत्या थी।

लेकिन हाईकोर्ट ने ध्यान दिलाया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट को मुकदमे में औपचारिक रूप से प्रदर्शित ही नहीं किया गया। अदालत के अनुसार, इतनी अहम दस्तावेजी साक्ष्य का रिकॉर्ड में न होना अभियोजन की बड़ी कमी है।

कोर्ट ने कहा कि केवल मौखिक बयान के आधार पर मृत्यु के कारण को निर्णायक रूप से स्थापित नहीं किया जा सकता।

आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप पर अदालत

अदालत ने कहा कि धारा 306 के तहत दोष सिद्ध करने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने जानबूझकर ऐसा व्यवहार किया जिससे पीड़िता आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो गई।

पीठ ने कहा:“सिर्फ पारिवारिक विवाद या सामान्य घरेलू तनाव को आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं माना जा सकता, जब तक स्पष्ट और निकट संबंध साबित न हो।”

कोर्ट के अनुसार, रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जो यह दिखाए कि आरोपियों ने जानबूझकर आत्महत्या के लिए उकसाया।

अदालत का निर्णय

सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है।

अदालत ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए कहा कि धारा 498A और 306 के तहत दोषसिद्धि कानून की दृष्टि में टिक नहीं सकती।

इसलिए अपील स्वीकार करते हुए आरोपी की सजा और दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया गया तथा उसे राहत प्रदान की गई।

Case Title: Purna Chandra Raul & Anr. vs State of West Bengal

Case No.: C.R.A. 114 of 1990

Decision Date: 05 March 2026

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