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कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मुआवज़े के लिए दूसरी एक्जीक्यूशन याचिका भी है मान्य

Vivek G.
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पश्चिम बंगाल राज्य बनाम शिलादित्य बनर्जी और अन्य। कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि अधिग्रहण मुआवज़े की राशि पूरी न मिलने पर दूसरी एक्जीक्यूशन याचिका भी दायर की जा सकती है।

कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मुआवज़े के लिए दूसरी एक्जीक्यूशन याचिका भी है मान्य

कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और ज़मीन मालिकों के बीच लंबे समय से चल रहे मुआवज़ा विवाद में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा कि यदि अवार्ड की पूरी रकम अदा नहीं हुई है, तो दूसरी बार भी एक्जीक्यूशन (निर्णय लागू कराने की प्रक्रिया) याचिका दायर की जा सकती है।

यह फैसला The State of West Bengal vs Shiladitya Banerjee & Ors. मामले में आया, जिसमें राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के ओरिजिनल साइड पर दाखिल दूसरी एक्जीक्यूशन याचिका की वैधता को चुनौती दी थी।

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मामले की पृष्ठभूमि

राज्य सरकार ने वर्ष 1997 में पश्चिम बंगाल भूमि (अधिग्रहण एवं अधिग्रहण) अधिनियम, 1948 के तहत कोलकाता के नर्केलडांगा मेन रोड स्थित एक संपत्ति का अधिग्रहण किया।

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कलेक्टर ने 28 फरवरी 1997 को मुआवज़े का अवार्ड घोषित किया। ज़मीन मालिक इस रकम से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने मामला संदर्भ अदालत (Reference Court) में भेजने की मांग की।

अलीपुर की विशेष भूमि अधिग्रहण अदालत ने 17 अगस्त 2001 को मुआवज़ा बढ़ा दिया। इसके खिलाफ राज्य सरकार हाईकोर्ट पहुंची।

साल 2017 में हाईकोर्ट ने शर्त के साथ स्थगन (स्टे) दिया और राज्य को 4.11 करोड़ रुपये जमा करने का निर्देश दिया। बाद में 2 दिसंबर 2024 को हाईकोर्ट ने बाज़ार मूल्य 4 लाख रुपये प्रति कट्ठा तय करते हुए मुआवज़ा और बढ़ा दिया।

राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की, जिसे 29 अगस्त 2025 को खारिज कर दिया गया।

इसके बाद ज़मीन मालिकों ने हाईकोर्ट में दूसरी एक्जीक्यूशन याचिका दायर की।

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अदालत में क्या हुआ?

राज्य की ओर से पेश हुए एडवोकेट जनरल ने दलील दी कि:

• दूसरी एक्जीक्यूशन याचिका कानूनन मान्य नहीं है।

• हाईकोर्ट को अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) नहीं है, क्योंकि मूल अवार्ड उसने पारित नहीं किया।

• जमा की गई रकम को अंतिम देय राशि से समायोजित किया जाना चाहिए।

वहीं, ज़मीन मालिकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून में अवार्ड को लागू कराने का अलग तंत्र नहीं है। इसलिए उसे डिक्री (न्यायालय के अंतिम आदेश) की तरह माना जाता है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “अवार्ड अपने आप में डिक्री नहीं है, लेकिन कानून की कल्पना (legal fiction) के जरिए उसे डिक्री का दर्जा दिया गया है।”

अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति देबांग्सु बसाक और न्यायमूर्ति एम.डी. शब्बार रशीदी की खंडपीठ ने विस्तार से कानून की धाराओं पर चर्चा की।

पीठ ने कहा,

“जब तक डिक्री या अवार्ड की पूरी रकम अदा नहीं होती, तब तक एक से अधिक एक्जीक्यूशन याचिका दाखिल की जा सकती है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि भूमि अधिग्रहण के तहत दिया गया अवार्ड सिविल कोर्ट की डिक्री नहीं होता, बल्कि कानूनी कल्पना के जरिए उसे डिक्री माना जाता है। इसलिए सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 38 यहां सीधे लागू नहीं होती।

पीठ ने कहा,

“चूंकि अवार्ड कलेक्टर ने पारित किया है और बाद में अदालतों ने उसे बढ़ाया है, इसलिए इसे ‘डीम्ड डिक्री’ माना जाएगा। ऐसे मामलों में धारा 38 लागू नहीं होती।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि राज्य सरकार ने यह नहीं कहा कि उसके पास हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में कोई संपत्ति नहीं है।

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अंतिम निर्णय

खंडपीठ ने दोनों मुख्य प्रश्नों का जवाब देते हुए कहा:

1. यदि अवार्ड की पूरी राशि अदा नहीं हुई है, तो दूसरी एक्जीक्यूशन याचिका दाखिल की जा सकती है।

2. हाईकोर्ट के ओरिजिनल साइड पर दाखिल एक्जीक्यूशन याचिका कानूनन मान्य है।

अदालत ने राज्य की अपील खारिज कर दी और एक्जीक्यूशन कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि देय और प्राप्त राशि के अंतिम हिसाब पर उसने कोई निर्णय नहीं दिया है।

अपील (APOT 277 of 2025) और संबंधित सभी आवेदन बिना किसी लागत (cost) के खारिज कर दिए गए।

Case Title: The State of West Bengal vs Shiladitya Banerjee & Ors.

Case No.: APOT 277 of 2025 (IA No. GA/1/2025)

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