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MOU विवाद को आपराधिक रंग नहीं दे सकते: कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2.01 करोड़ केस में कार्यवाही रद्द की

Vivek G.
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कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2.01 करोड़ रुपये के MOU विवाद में धोखाधड़ी व आपराधिक विश्वासघात की कार्यवाही रद्द की, कहा-यह सिविल मामला है।

MOU विवाद को आपराधिक रंग नहीं दे सकते: कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2.01 करोड़ केस में कार्यवाही रद्द की

कोलकाता हाईकोर्ट में शुक्रवार को एक अहम फैसला आया, जिसमें रियल एस्टेट विकास से जुड़े एक पुराने विवाद को आपराधिक मामला मानने से इनकार कर दिया गया। अदालत ने साफ कहा कि केवल अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) के उल्लंघन को धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात नहीं कहा जा सकता।

यह आदेश न्यायमूर्ति अजय कुमार गुप्ता ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया। मामला वर्ष 2014 के एक एमओयू (समझौता ज्ञापन) से जुड़ा था।

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मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता सिद्धार्थ सेठिया व अन्य ने दायर याचिका में वर्ष 2021 में दर्ज आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी। शिकायतकर्ता कंपनी ने आरोप लगाया था कि 29 अप्रैल 2014 को भूमि विकास के लिए हुए एमओयू के आधार पर 2.01 करोड़ रुपये दिए गए, लेकिन बाद में जमीन तीसरे पक्ष को बेच दी गई और रकम वापस नहीं की गई।

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शिकायत में भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 406 (आपराधिक विश्वासघात), 120B (षड्यंत्र) और 34 (साझा मंशा) के तहत आरोप लगाए गए थे। निचली अदालत ने 24 अगस्त 2021 को संज्ञान लेकर समन जारी किया था।

बाद में गैर-जमानती वारंट भी जारी हुआ, जिसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत में कहा कि पूरा विवाद एक व्यावसायिक समझौते से जुड़ा है। “शुरुआत से ही कोई धोखाधड़ी की मंशा नहीं थी। रकम सुरक्षा जमा (सिक्योरिटी डिपॉजिट) के तौर पर दी गई थी,” यह दलील दी गई।

उन्होंने यह भी बताया कि शिकायतकर्ता पहले ही इसी लेन-देन को लेकर दीवानी (सिविल) मुकदमा दायर कर चुका है, जिससे साफ है कि विवाद अनुबंध के पालन को लेकर है, न कि किसी आपराधिक कृत्य को लेकर।

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अदालत की मुख्य टिप्पणियाँ

न्यायमूर्ति अजय कुमार गुप्ता ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद कहा कि पूरे मामले की जड़ एमओयू की शर्तों के पालन से जुड़ी है।

अदालत ने स्पष्ट किया, “धोखाधड़ी का अपराध तभी बनता है जब शुरुआत से ही धोखा देने की मंशा हो।”

फैसले में कहा गया कि शिकायत में ऐसा कोई ठोस आरोप नहीं है जिससे यह साबित हो कि समझौता करते समय याचिकाकर्ताओं की नीयत बेईमान थी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राशि वापस नहीं भी की गई हो, तब भी हर अनुबंध उल्लंघन को आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता।

न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि “व्यावसायिक विवादों को दबाव बनाने के लिए आपराधिक मुकदमे का रूप देना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”

सिविल बनाम क्रिमिनल विवाद

अदालत ने विस्तार से समझाया कि आपराधिक विश्वासघात (धारा 406) के लिए संपत्ति का किसी भरोसे के तहत सौंपा जाना जरूरी है। यहां भुगतान एक व्यावसायिक समझौते के तहत हुआ था, न कि किसी ट्रस्ट या विशेष भरोसे के तहत।

इसी तरह, धारा 420 के तहत धोखाधड़ी साबित करने के लिए शुरुआत में ही गलत इरादा होना आवश्यक है।

न्यायालय ने कहा, “सिर्फ अनुबंध पूरा न होना या बाद में विवाद पैदा होना, अपने आप में आपराधिक अपराध नहीं बनता।”

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अंतिम निर्णय

अदालत ने पाया कि शिकायत में आपराधिक तत्व का अभाव है और यह मामला मूलतः दीवानी प्रकृति का है।

इसलिए, हाईकोर्ट ने निचली अदालत में लंबित पूरी आपराधिक कार्यवाही को याचिकाकर्ताओं के खिलाफ रद्द कर दिया। 24 अगस्त 2021 का समन आदेश भी निरस्त कर दिया गया।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संबंधित पक्ष अपने अधिकारों के लिए दीवानी अदालत में उपाय कर सकते हैं, लेकिन आपराधिक मुकदमे का सहारा नहीं लिया जा सकता।

Case Title: Siddharth Sethia & Ors. vs The State of West Bengal & Anr.

Case No.: C.R.R. 3637 of 2022

Decision Date: 13 February 2026

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