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9 साल से पाल रहे बच्चे को नहीं छीन सकते: कर्नाटक हाईकोर्ट ने CWC को दिया जांच का निर्देश

Vivek G.
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याचिकाकर्ता बनाम बाल कल्याण समिति, शिवमोग्गा, कर्नाटक हाईकोर्ट ने 9 साल से पाल रहे बच्चे की कस्टडी बरकरार रखी, CWC को जांच और CARA को गोद लेने की प्रक्रिया तेज करने का निर्देश।

9 साल से पाल रहे बच्चे को नहीं छीन सकते: कर्नाटक हाईकोर्ट ने CWC को दिया जांच का निर्देश

बेंगलुरु की अदालत में गुरुवार को एक ऐसा मामला सामने आया जिसने अदालत कक्ष को भावुक कर दिया। एक दंपति, जो पिछले लगभग दस वर्षों से एक परित्यक्त बच्चे का पालन-पोषण कर रहे हैं, ने अपने ही संरक्षण पर सवाल उठाए जाने के खिलाफ न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने साफ कहा कि बच्चे का सर्वोच्च हित (paramount interest) सबसे अहम है, और फिलहाल वह अपने पालक माता-पिता के साथ ही रहेगा।

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मामले की पृष्ठभूमि

दंपति की उम्र लगभग 51 और 54 वर्ष है। 10 जून 2016 को वे Sri Gavisiddeshwara Swami Mutt गए थे। वहां तीन दिन का नवजात शिशु परित्यक्त अवस्था में मिला। मठ के स्वामीजी की सलाह पर दंपति ने बच्चे को अपने संरक्षण में ले लिया।

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वे उसे शिवमोग्गा ले आए, नाम दिया, स्कूल में दाखिला कराया और अपने सगे बच्चे की तरह पाला। अदालत में बताया गया कि उनका एक दिव्यांग बेटा 12 साल की उम्र में गुजर गया था और एक बेटी जन्म के चार महीने बाद चल बसी थी। उनके कोई जैविक संतान जीवित नहीं है।

लेकिन जुलाई 2017 में Child Welfare Committee (सीडब्ल्यूसी) ने नोटिस जारी कर पूछा कि बच्चे की कस्टडी कानूनी है या नहीं। बाद में 6 फरवरी 2020 को अखबार में प्रकाशन कर दावा किया गया कि बच्चा अवैध रूप से दंपति के पास है और यदि कोई अभिभावक हो तो सामने आए।

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अदालत में क्या हुआ

दंपति की ओर से कहा गया कि अखबार में सूचना के बाद भी कोई जैविक अभिभावक सामने नहीं आया। उन्होंने 2021 में फोस्टर केयर के लिए आवेदन भी दिया था।

उनके वकील ने अदालत में कहा, “बच्चा अब साढ़े नौ साल का है। उसे अचानक अलग करना अमानवीय होगा।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे हर कानूनी प्रक्रिया का पालन करने को तैयार हैं।

सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि किशोर न्याय नियमों के तहत हर ऐसे बच्चे को पहले सीडब्ल्यूसी के समक्ष पेश किया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा, “समिति को नियम 19 के तहत जांच करने का अधिकार है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि बच्चे का हित सुरक्षित है।”

कोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति डी.के. सिंह ने आदेश सुनाते हुए कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि बच्चा जन्म के तीन दिन बाद मठ में छोड़ा गया था और तब से दंपति के संरक्षण में है।

अदालत ने कहा, “बच्चे का कल्याण और संरक्षण सर्वोपरि है। वर्तमान परिस्थितियों में यह हित याचिकाकर्ताओं के पास सुरक्षित प्रतीत होता है।”

न्यायालय ने माना कि प्रक्रिया में चूक हो सकती है, लेकिन इससे बच्चे के वर्तमान जीवन को झटका नहीं दिया जा सकता।

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अदालत का फैसला

अदालत ने निर्देश दिया कि 10 मार्च 2026 को दंपति बच्चे को बेंगलुरु स्थित सीडब्ल्यूसी के समक्ष प्रस्तुत करें। समिति नियम 19 के तहत जांच पूरी करेगी और देखेगी कि बच्चे का हित सुरक्षित है या नहीं।

साथ ही, Central Adoption Resource Authority (कारा) को निर्देश दिया गया कि सीडब्ल्यूसी की जांच पूरी होने के बाद दंपति के गोद लेने के आवेदन को शीघ्रता से प्रोसेस किया जाए।

सबसे अहम बात, अदालत ने साफ किया कि जांच के दौरान भी बच्चा दंपति की कस्टडी में ही रहेगा।

इन निर्देशों के साथ रिट याचिका का निस्तारण कर दिया गया।

Case Title: Petitioners vs Child Welfare Committee, Shivamogga

Case No.: WP No. 18481 of 2021

Decision Date: 05 February 2026

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