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सीबीआई ग्रांट धोखाधड़ी मामला: हिमाचल हाईकोर्ट ने पाली दीवान की रिहाई याचिका ठुकराई, ट्रायल जारी रहेगा

Vivek G.
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पाली दीवान बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो, हिमाचल हाईकोर्ट ने CBI ग्रांट-इन-एड फर्जीवाड़ा मामले में पाली दीवान की डिस्चार्ज याचिका खारिज की, ट्रायल जारी रहेगा।

सीबीआई ग्रांट धोखाधड़ी मामला: हिमाचल हाईकोर्ट ने पाली दीवान की रिहाई याचिका ठुकराई, ट्रायल जारी रहेगा

शिमला स्थित हिमाचल हाईकोर्ट में नए साल के पहले दिन एक अहम आदेश सुनाया गया। अदालत ने सीबीआई के कथित ग्रांट घोटाले में आरोपी पाली दीवान को राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया (prima facie) ट्रायल चलाने के लिए पर्याप्त है।

यह आदेश 1 जनवरी 2026 को न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की एकल पीठ ने सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

सीबीआई के अनुसार, पाली दीवान, जो M/s Resource Foods से जुड़ी हैं, ने वर्ष 2010 में खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय (MoFPI) से “इंटीग्रेटेड फूड चेन प्रोजेक्ट” के लिए गैर-आवर्ती अनुदान (grant-in-aid) पाने हेतु आवेदन किया था।

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जांच एजेंसी का आरोप है कि इस आवेदन के साथ फर्जी बिल, चालान और प्रमाणपत्र लगाए गए थे। ये दस्तावेज अलग-अलग सप्लायर्स के नाम से दिखाए गए, लेकिन बाद में संबंधित कंपनियों ने कहा कि उन्होंने ऐसे कोई बिल जारी नहीं किए।

ट्रायल कोर्ट (स्पेशल जज, CBI) ने आरोप तय करने से पहले पाली दीवान की डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी थी। उसी आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की गई।

याचिकाकर्ता का पक्ष

पाली दीवान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि उन्होंने केवल निर्धारित प्रारूप में आवेदन जमा किया था।

उनका तर्क था:

• उन्होंने कोई फर्जी दस्तावेज स्वयं प्रस्तुत नहीं किए।

• चार्जशीट में उनके हस्ताक्षर या दस्तावेज प्रस्तुत करने का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

• मूल (original) दस्तावेज पेश नहीं किए गए, केवल फोटोकॉपी पर मामला आधारित है।

• हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की राय भी फोटोकॉपी पर आधारित है, जो स्वीकार्य नहीं है।

• आपराधिक कानून में “विकेरियस लाइबिलिटी” (दूसरे के कृत्य के लिए जिम्मेदारी) स्वतः लागू नहीं होती।

वकील ने कोर्ट से कहा, “सिर्फ पार्टनर या डायरेक्टर होने से किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।”

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सीबीआई का जवाब

सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक ने जोर देकर कहा कि आरोपी ने अन्य परिजनों के साथ मिलकर दस्तावेजों में हेरफेर की।

जांच के दौरान कई गवाहों ने बयान दिया कि:

• जो कोटेशन उन्होंने भेजे थे, उन्हें बाद में एडिट किया गया।

• रकम में भारी बढ़ोतरी की गई।

• नाम और तारीख बदले गए।

एजेंसी का दावा था कि इन बदले हुए दस्तावेजों के आधार पर मंत्रालय से अनुदान लिया गया।

अभियोजन ने कहा, “यह महज तकनीकी गलती नहीं, बल्कि सुनियोजित साजिश का मामला है।”

अदालत की टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया।

पीठ ने कहा कि आरोप तय करने के चरण पर अदालत को केवल यह देखना होता है कि क्या प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

अदालत ने टिप्पणी की,

“इस स्तर पर साक्ष्यों का गहराई से मूल्यांकन करना उचित नहीं है। यदि सामग्री ट्रायल शुरू करने के लिए पर्याप्त है, तो आरोप तय किए जा सकते हैं।”

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मूल दस्तावेजों की अनुपस्थिति पर कोर्ट ने कहा कि यह ट्रायल का विषय है। केवल इस आधार पर आरोपी को अभी मुक्त नहीं किया जा सकता।

हस्तलेखन नमूने (specimen signatures) लेने के मुद्दे पर भी अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी के पास ऐसा करने का अधिकार है, और यह प्रक्रिया अवैध नहीं मानी जा सकती।

साजिश (Conspiracy) पर अदालत का दृष्टिकोण

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक साजिश अक्सर प्रत्यक्ष साक्ष्य से सिद्ध नहीं होती। परिस्थितियों और दस्तावेजों से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि क्या “मीटिंग ऑफ माइंड्स” यानी साझा इरादा था।

रिकॉर्ड पर मौजूद बयानों को देखते हुए अदालत ने माना कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि आवेदन के साथ संशोधित और फर्जी दस्तावेज लगाए गए।

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अंतिम निर्णय

अंततः न्यायालय ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का आदेश सही था और उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा,

“रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री आरोप तय करने के लिए पर्याप्त है। याचिका में कोई दम नहीं है।”

इसके साथ ही पाली दीवान की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई। ट्रायल अब नियमानुसार आगे बढ़ेगा।

Case Title: Pali Diwan vs Central Bureau of Investigation

Case No.: Cr. Rev. No. 532 of 2024

Decision Date: 01 January 2026

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