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छह दिन की देरी भी माफ नहीं: गुजरात हाईकोर्ट ने GST अपील खारिज करने के आदेश को बरकरार रखा

Shivam
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हर्ष दीपक शाह बनाम भारत संघ और अन्य - गुजरात उच्च न्यायालय ने जीएसटी संबंधी रिट याचिका खारिज की, 6 दिन की देरी को माफ करने से इनकार किया और जीएसटी अधिनियम की धारा 107 के तहत अपील को समय-बाधित घोषित किया।

छह दिन की देरी भी माफ नहीं: गुजरात हाईकोर्ट ने GST अपील खारिज करने के आदेश को बरकरार रखा

गुजरात उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि जीएसटी कानून के तहत अपील दाखिल करने की समय-सीमा का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। अदालत ने छह दिन की देरी से दायर अपील को स्वीकार करने से इनकार करते हुए करदाता की याचिका खारिज कर दी।

यह मामला Harsh Deepak Shah बनाम Union of India से जुड़ा था, जिसमें करदाता ने अपीलीय प्राधिकरण द्वारा देरी के आधार पर अपील खारिज किए जाने को चुनौती दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ने 24 अप्रैल 2024 को पारित Order-in-Original को चुनौती देते हुए अपील दायर की थी। यह अपील 5 अक्टूबर 2024 को दाखिल की गई, जो वैधानिक सीमा से छह दिन बाद थी।

GST अधिनियम की धारा 107 के अनुसार, अपील तीन महीने के भीतर दाखिल की जानी चाहिए और पर्याप्त कारण होने पर अधिकतम एक माह की अतिरिक्त छूट मिल सकती है। यानी कुल मिलाकर 120 दिन की सीमा तय है।

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हालांकि, अपीलीय प्राधिकरण ने यह कहते हुए अपील खारिज कर दी कि वह 120 दिनों से आगे की देरी माफ करने का अधिकार नहीं रखता।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि देरी केवल छह दिन की थी और अदालत अपने संविधानिक अधिकारों के तहत इस देरी को माफ कर सकती है। वकील ने यह भी बताया कि करदाता पहले ही ₹14.35 लाख से अधिक GST चुका चुका है और अपील दाखिल करते समय ₹4.57 लाख और जमा किए गए। शेष राशि चुकाने की भी पेशकश की गई।

सरकार की ओर से कहा गया कि कानून में तय समय-सीमा के बाद अपील स्वीकार करना संभव नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि जब कानून अधिकतम सीमा तय करता है, तो अदालतें भी उससे आगे नहीं जा सकतीं।

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अदालत की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति ए.एस. सुपेहिया और न्यायमूर्ति प्रणव त्रिवेदी की पीठ ने कहा कि GST कानून में अपील की समय-सीमा बिल्कुल स्पष्ट है।

पीठ ने टिप्पणी की,

“जब विधायिका ने अपील के लिए अधिकतम समय तय कर दिया है, तो अदालत उस सीमा को अनदेखा नहीं कर सकती।”

अदालत ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय की शक्तियां व्यापक जरूर हैं, लेकिन वे कानून की मंशा के खिलाफ नहीं जा सकतीं।

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अदालत ने यह भी साफ किया कि जब याचिकाकर्ता ने पहले ही वैकल्पिक उपाय यानी अपील का रास्ता चुना था, तो अब सीधे Order-in-Original को चुनौती नहीं दी जा सकती। यदि आदेश प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन या अधिकार क्षेत्र से बाहर होता, तो अलग बात होती, लेकिन यहां ऐसा कोई आधार नहीं पाया गया।

अंतिम निर्णय

सभी दलीलों पर विचार करने के बाद, गुजरात हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और अपीलीय प्राधिकरण के आदेश को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि छह दिन की देरी भी कानून के दायरे से बाहर है और इसे माफ नहीं किया जा सकता।

मामले में कोई लागत नहीं लगाई गई।

Case Title:- Harsh Deepk Shah vs Union of India & Others

Case Number:- Special Civil Application No. 17382 of 2025

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