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तकनीकी आपत्तियों पर नहीं रुकेगी भ्रष्टाचार जांच: ACB FIR रद्द करने वाला हाईकोर्ट फैसला सुप्रीम कोर्ट ने पलटा

Vivek G.
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संयुक्त निदेशक (रायलसीमा), भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, ए.पी. बनाम दयाम पेड़ा रंगा राव और अन्य, ACB FIRs पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, तकनीकी आधार पर रद्द जांच को बताया गलत, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का आदेश रद्द।

तकनीकी आपत्तियों पर नहीं रुकेगी भ्रष्टाचार जांच: ACB FIR रद्द करने वाला हाईकोर्ट फैसला सुप्रीम कोर्ट ने पलटा

नई दिल्ली की कोर्ट नंबर में माहौल गंभीर था। लंबी दलीलों और मोटी फाइलों के बीच Supreme Court of India ने एक अहम सवाल पर साफ रुख अपनाया-क्या सिर्फ तकनीकी आधार पर भ्रष्टाचार के मामलों की जांच रोकी जा सकती है? जवाब था, नहीं। अदालत ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें ACB द्वारा दर्ज कई FIR केवल “अधिसूचना की कमी” के आधार पर रद्द कर दी गई थीं।

मामले की पृष्ठभूमि

आंध्र प्रदेश में वर्ष 2016 से 2020 के बीच भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कई मामले दर्ज हुए। ये FIR विजयवाड़ा स्थित ACB के सेंट्रल इन्वेस्टिगेशन यूनिट कार्यालय से दर्ज की गई थीं।

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आरोपियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी कि विजयवाड़ा का यह कार्यालय विधिवत “पुलिस स्टेशन” घोषित नहीं था, इसलिए FIR दर्ज करने का अधिकार नहीं बनता। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए सभी FIR रद्द कर दीं।

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राज्य की ओर से कहा गया कि 2003 का सरकारी आदेश पहले ही ACB कार्यालयों को पुलिस स्टेशन घोषित करता है। आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के बाद भी पुराने कानून और अधिसूचनाएं तब तक लागू रहती हैं, जब तक उन्हें बदला या रद्द न किया जाए।

सरकार ने यह भी बताया कि 2022 में जारी स्पष्टीकरण आदेश केवल स्थिति स्पष्ट करने के लिए था, नया अधिकार देने के लिए नहीं।

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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान पीठ ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण को “अत्यधिक तकनीकी” बताया। अदालत ने कहा कि कानून की आत्मा को नजरअंदाज कर केवल प्रक्रिया के नाम पर जांच को कुचलना न्याय के हित में नहीं है।

पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जब राज्य का पुनर्गठन केवल सीमाओं का पुनर्संयोजन है, तो पहले से लागू कानून स्वतः समाप्त नहीं हो जाते।”

अदालत ने यह भी जोड़ा कि यदि हर बार नए सिरे से अधिसूचना की मांग की जाए, तो इससे प्रशासनिक अराजकता और कानूनी शून्यता पैदा होगी।

हाईकोर्ट ने 2022 के सरकारी आदेश को भविष्यकालीन मानते हुए पुराने मामलों पर लागू न करने की बात कही थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की, “स्पष्टीकरण आदेश को पिछली तारीख से लागू करने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि वह पहले से मौजूद कानूनी स्थिति को स्पष्ट करता है, न कि नया कानून बनाता है।”

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फैसला

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।

अदालत ने कहा कि ACB द्वारा दर्ज FIR वैध थीं और जांच को आगे बढ़ने से नहीं रोका जा सकता। साथ ही यह निर्देश भी दिया गया कि जांच छह महीने के भीतर पूरी की जाए और इस दौरान आरोपियों के खिलाफ कोई जबरन कार्रवाई न की जाए, बशर्ते वे सहयोग करें।

Case Title: The Joint Director (Rayalaseema), ACB Andhra Pradesh vs Dayam Peda Ranga Rao & Ors.

Case No.: Criminal Appeals arising out of SLP (Crl) Nos. 14321–14333 of 2025

Decision Date: 08 January 2026

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