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दिल्ली हाईकोर्ट ने फर्जी पासपोर्ट सत्यापन मामले में पूर्व ASI की सजा बरकरार रखी, CBI केस में अपील खारिज

Shivam
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दिल्ली हाईकोर्ट ने फर्जी पासपोर्ट सत्यापन मामले में पूर्व एएसआई सुबे सिंह की दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखते हुए उनकी अपील खारिज कर दी। - सुबे सिंह बनाम सीबीआई

दिल्ली हाईकोर्ट ने फर्जी पासपोर्ट सत्यापन मामले में पूर्व ASI की सजा बरकरार रखी, CBI केस में अपील खारिज

दिल्ली उच्च न्यायालय ने फर्जी पते और जाली दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट जारी कराने से जुड़े भ्रष्टाचार मामले में दोषी ठहराए गए दिल्ली पुलिस के पूर्व एएसआई सुबे सिंह की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि पुलिस सत्यापन रिपोर्ट गलत तरीके से तैयार की गई थी, जिसके आधार पर पासपोर्ट जारी हुआ।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, चार आरोपियों ने कथित तौर पर 1993 में जाली दस्तावेजों और फर्जी पतों का इस्तेमाल करके पासपोर्ट प्राप्त करने की साजिश रची थी। उस समय दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा में सहायक सब-इंस्पेक्टर के पद पर तैनात सूबे सिंह को पासपोर्ट आवेदकों के पुलिस सत्यापन का कार्य सौंपा गया था।

केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने फर्जी पासपोर्ट जारी करने के संबंध में गुप्त सूचना प्राप्त होने के बाद अप्रैल 1995 में मामला दर्ज किया। एजेंसी ने आरोप लगाया कि पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए जाली राशन कार्ड और फर्जी पते के विवरण का इस्तेमाल किया गया था।

ट्रायल कोर्ट ने बाद में सुबे सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 120-B और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(d) के साथ धारा 13(2) के तहत दोषी ठहराया। उन्हें कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई, जबकि एक सह-आरोपी को बरी कर दिया गया।

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न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने कहा कि जिन पते पर पासपोर्ट आवेदन में निवास दिखाया गया था, वहां रहने वाले गवाहों ने अदालत में साफ कहा कि संबंधित व्यक्ति कभी वहां नहीं रहा।

अदालत ने कहा,

“गवाहों की गवाही से स्पष्ट है कि सत्यापन रिपोर्ट वास्तविक तथ्यों के विपरीत थी और इसी गलत रिपोर्ट के आधार पर पासपोर्ट जारी किया गया।”

कोर्ट ने यह भी माना कि पुलिस अधिकारी का यह दावा भरोसेमंद नहीं है कि उन्होंने मौके पर जाकर जांच की थी। फैसले में कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित होता है कि सत्यापन रिपोर्ट झूठी थी और इसका लाभ पासपोर्ट आवेदक को मिला।

हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक साजिश के मामलों में प्रत्यक्ष साक्ष्य मिलना हमेशा संभव नहीं होता और ऐसे मामलों में परिस्थितिजन्य साक्ष्य महत्वपूर्ण होते हैं।

अदालत ने कहा,

“साजिश अक्सर गोपनीय तरीके से रची जाती है, इसलिए इसे परिस्थितियों और संबंधित व्यक्तियों के आचरण से समझा जाता है।”

कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि आरोपी अधिकारी ने गलत विवरण वाले आवेदन को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई, जिससे आपराधिक साजिश का आरोप भी बनता है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है और दोषसिद्धि को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। इसके साथ ही अदालत ने सुबे सिंह की अपील खारिज कर दी और सजा को बरकरार रखा।

Case Details

Case Title: Sube Singh v. C.B.I.

Case Number: CRL.A. 1063/2006

Judge: Justice Chandrasekharan Sudha

Decision Date: May 5, 2026

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