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कानूनी रिसर्च और आदेश समझने में देरी का बहाना नहीं चलेगा: दिल्ली हाई कोर्ट ने 1 साल बाद दाखिल याचिका खारिज की

Shivam
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दिल्ली हाई कोर्ट ने 1 साल से अधिक देरी को बिना पर्याप्त कारण मानते हुए याचिका खारिज की, कहा कि “कानूनी रिसर्च” देरी का उचित आधार नहीं है। - अजीत कुमार गोला बनाम राज्य (GNCTD) एवं अन्य।

कानूनी रिसर्च और आदेश समझने में देरी का बहाना नहीं चलेगा: दिल्ली हाई कोर्ट ने 1 साल बाद दाखिल याचिका खारिज की

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में यह स्पष्ट कर दिया कि अदालत में देरी से आने के लिए ठोस और ठोस कारण जरूरी है। महज “कानूनी समझने में समय लगा” जैसी दलीलें पर्याप्त नहीं मानी जाएंगी। अदालत ने 1 वर्ष से अधिक की देरी को बिना उचित कारण के मानते हुए याचिका खारिज कर दी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अजीत कुमार गोला द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत दायर एक याचिका से उत्पन्न हुआ, जिसमें सत्र न्यायालय के 19 जनवरी, 2023 के आदेश को चुनौती दी गई थी। सत्र न्यायालय ने एक आरोपी को बरी कर दिया था और एक समन आदेश को रद्द कर दिया था।

हालांकि, मामले की खूबियों की जांच करने से पहले, उच्च न्यायालय को यह तय करना था कि याचिका दायर करने में एक वर्ष से अधिक की देरी को माफ किया जा सकता है या नहीं। याचिकाकर्ता स्वयं उपस्थित होकर यह तर्क दिया कि देरी न तो जानबूझकर की गई थी और न ही सोची-समझी थी, बल्कि यह आदेश के कानूनी निहितार्थों को समझने के उनके प्रयास के कारण हुई थी।

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याचिकाकर्ता, जो स्वयं एक अधिवक्ता हैं, ने अदालत के सामने कहा कि:

• उन्हें लगा कि धारा 482 CrPC के तहत कोई तय समय सीमा नहीं है

• आदेश को समझने और कानूनी रिसर्च करने में समय लग गया

• देरी जानबूझकर नहीं थी

उन्होंने यह भी कहा कि “मामले को तकनीकी आधार पर नहीं बल्कि मेरिट पर सुना जाना चाहिए।”

राज्य और अन्य प्रतिवादियों ने इस दलील का कड़ा विरोध किया।

उन्होंने कहा कि:

• याचिकाकर्ता को आदेश की पूरी जानकारी थी

• एक साल से अधिक की देरी लापरवाही को दर्शाती है

• कोई ठोस या दिन-प्रतिदिन का स्पष्टीकरण नहीं दिया गया

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न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्णा कांत शर्मा की पीठ ने साफ कहा कि:

“देरी की अवधि नहीं, बल्कि देरी का कारण महत्वपूर्ण होता है। यदि कारण पर्याप्त नहीं है, तो देरी माफ नहीं की जा सकती।”

अदालत ने यह भी कहा:

“सिर्फ यह कहना कि आदेश समझने में समय लगा, विशेषकर जब याचिकाकर्ता स्वयं अधिवक्ता हैं, देरी को उचित नहीं ठहरा सकता।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:

• भले ही धारा 482 CrPC में समय सीमा तय नहीं है,

• फिर भी याचिका “उचित समय” के भीतर दायर होनी चाहिए

• आमतौर पर 90 दिन को एक उचित समय माना जाता है

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अदालत ने पाया कि:

• याचिकाकर्ता ने देरी के हर चरण का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया

• “कानूनी रिसर्च” या “समझने में समय” जैसी दलीलें पर्याप्त कारण नहीं हैं

• यह देरी “लापरवाही और विलंब” (delay and laches) का उदाहरण है

अदालत ने देरी माफी (condonation of delay) की अर्जी को खारिज कर दिया।

इसके परिणामस्वरूप, मुख्य याचिका भी खारिज कर दी गई।

Case Details

Case Title: Ajit Kumar Gola vs. State (GNCTD) & Anr.

Case Number: CRL.M.C. 1913/2024

Decision Date: 04 April 2026

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