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दिल्ली हाईकोर्ट ने रिश्वत मामले में कॉन्स्टेबल की सजा बरकरार रखी, कहा- मांग और स्वीकार दोनों साबित

Shivam
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दिल्ली हाईकोर्ट ने रिश्वत मामले में दोषी कॉन्स्टेबल की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट की सजा को बरकरार रखा। - कांस्टेबल सतीश कुमार बनाम दिल्ली राज्य

दिल्ली हाईकोर्ट ने रिश्वत मामले में कॉन्स्टेबल की सजा बरकरार रखी, कहा- मांग और स्वीकार दोनों साबित

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराए गए एक पुलिस कॉन्स्टेबल की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य मांग और स्वीकार की गई रिश्वत को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 1994 का है, जब आरोपी कॉन्स्टेबल सतिश कुमार पर आरोप था कि उन्होंने एक व्यक्ति से उसकी पहचान पत्र (ID कार्ड) लौटाने के बदले ₹1,000 रिश्वत मांगी और स्वीकार की। शिकायत के आधार पर एंटी-करप्शन ब्रांच ने ट्रैप ऑपरेशन किया और आरोपी को कथित रूप से रंगे हाथों पकड़ा गया।

ट्रायल कोर्ट ने 2004 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए एक-एक साल की सजा और जुर्माना लगाया था, जिसके खिलाफ यह अपील दाखिल की गई थी।

अपील में यह तर्क दिया गया कि मुख्य शिकायतकर्ता (informant) को अदालत में पेश नहीं किया गया, जिससे मामले की नींव कमजोर हो जाती है। साथ ही यह भी कहा गया कि गवाहों की गवाही में कथित तौर पर विरोधाभास हैं और अभियोजन की कहानी पूरी तरह साबित नहीं होती।

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न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि केवल शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति से पूरा मामला खत्म नहीं हो जाता।

अदालत ने कहा,

“रिश्वत की मांग और स्वीकार को अन्य साक्ष्यों और परिस्थितियों से भी साबित किया जा सकता है।”

अदालत ने पंच गवाह (shadow witness) की गवाही को विश्वसनीय माना और कहा कि उसमें कोई ऐसा कारण नहीं दिखता जिससे उसकी बात पर संदेह किया जाए।

कोर्ट ने पाया कि ट्रैप के दौरान बरामद की गई रकम, केमिकल टेस्ट (हाथ और कपड़े के धुलाव का गुलाबी होना) और गवाह की सुसंगत गवाही से यह स्पष्ट होता है कि आरोपी ने रिश्वत स्वीकार की थी।

अदालत ने कहा,

“जब मांग और स्वीकार दोनों स्थापित हो जाते हैं, तो कानून के तहत अभियोजन के पक्ष में अनुमान (presumption) बनता है, जिसे आरोपी खंडित नहीं कर पाया।”

अपील में अभियोजन की स्वीकृति (sanction) को भी चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने माना कि जिस अधिकारी ने स्वीकृति दी, वह कानून के तहत सक्षम था, क्योंकि उसके पास आरोपी को सेवा से हटाने की शक्ति थी।

अदालत ने सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

अंत में अदालत ने कहा,

“इस न्यायालय को निचली अदालत के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं मिलता।”

इसके साथ ही अपील को खारिज कर दिया गया।

Case Details:

Case Title: Const. Satish Kumar v. State of Delhi

Case Number: CRL.A. 862/2004

Judge: Justice Chandrasekharan Sudha

Decision Date: 27 April 2026

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