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दिल्ली उच्च न्यायालय ने ससुर द्वारा छोड़ी गई संयुक्त बैंक निधि में माता के अधिकार को बरकरार रखा और पुत्र की अपील खारिज कर दी।

Shivam
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दिल्ली हाईकोर्ट ने संयुक्त बैंक खाते की रकम पर मां के अधिकार को मानते हुए बेटे की अपील खारिज कर दी और ₹8.99 लाख देने का आदेश बरकरार रखा। - श्री दिलीप सिंह बनाम श्रीमती गिरिजा देवी

दिल्ली उच्च न्यायालय ने ससुर द्वारा छोड़ी गई संयुक्त बैंक निधि में माता के अधिकार को बरकरार रखा और पुत्र की अपील खारिज कर दी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम पारिवारिक संपत्ति विवाद में ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए बेटे की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि मृतक द्वारा छोड़ी गई संयुक्त बैंक खाते की रकम पर मां का वैध अधिकार बनता है और उसका दावा समय-सीमा (Limitation) से बाहर नहीं माना जा सकता।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की एकल पीठ ने दिलीप सिंह द्वारा दायर नियमित प्रथम अपील को खारिज करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में किसी तरह की कानूनी त्रुटि या अनियमितता नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला गौतम नगर, दिल्ली स्थित एक परिवार से जुड़ा है। याचिकाकर्ता गिरिजा देवी ने अपने बेटे दिलीप सिंह के खिलाफ ₹8,99,015 की वसूली का सिविल मुकदमा दायर किया था। उनका दावा था कि यह रकम उनके दिवंगत ससुर प्रभु नाथ सिंह के संयुक्त बैंक खाते में जमा थी, जिसमें उनका भी हिस्सा था।

रिकॉर्ड के अनुसार, प्रभु नाथ सिंह ने अपने जीवनकाल में एक संयुक्त बैंक खाता खोला था, जिसमें वे स्वयं, उनकी बहू गिरिजा देवी और पोते दिलीप सिंह संयुक्त धारक थे। जुलाई 2009 में खाते में करीब ₹17.98 लाख मौजूद थे।

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गिरिजा देवी ने आरोप लगाया कि अगस्त 2009 में प्रभु नाथ सिंह की मृत्यु के बाद दिलीप सिंह ने खाते से रकम निकाल ली और उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने 26 जून 2007 की उस वसीयत का उल्लेख किया, जो पहले ही Probate कार्यवाही में साबित हो चुकी थी। वसीयत में स्पष्ट लिखा था कि संयुक्त बैंक और पोस्ट ऑफिस खातों में जमा रकम संबंधित संयुक्त खाताधारकों को मिलेगी।

हाईकोर्ट ने कहा,

“वसीयत की भाषा पूरी तरह स्पष्ट है और इससे टेस्टेटर की मंशा साफ जाहिर होती है।”

अदालत ने माना कि प्रभु नाथ सिंह की मृत्यु के बाद खाते में मौजूद रकम पर गिरिजा देवी और दिलीप सिंह दोनों का बराबर अधिकार बनता था।

दिलीप सिंह ने अदालत में कहा कि मामला पहले ही 2009 में परिवार के भीतर सुलझ चुका था और मुकदमा बहुत देर से दायर किया गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मां को 2009 से ही खाते की जानकारी थी, इसलिए दावा समय-सीमा से बाहर है।

लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि केवल खाते के संचालन की जानकारी होना, अधिकार से इनकार माने जाने के बराबर नहीं है।

पीठ ने कहा,

“मुकदमा दायर करने का अधिकार तभी पैदा होता है, जब किसी व्यक्ति का दावा स्पष्ट रूप से ठुकराया जाए या उसे उसका हिस्सा न दिया जाए।”

अदालत ने पाया कि गिरिजा देवी ने पहली बार 2013 में डुप्लीकेट पासबुक मिलने और कानूनी नोटिस भेजने के बाद अपने हिस्से का दावा किया था। इसलिए 2014 में दायर मुकदमा समय-सीमा के भीतर था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें गिरिजा देवी को ₹8,99,015 और 6% वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार नहीं है, जिससे निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप किया जाए।

Case Details:

Case Title: Mr. Dileep Singh vs. Smt. Girija Devi

Case Number: RFA 481/2026

Judge: Justice Neena Bansal Krishna

Decision Date: May 21, 2026

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