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दिल्ली उच्च न्यायालय ने नाबालिग पर हमले के मामले में POCSO की सजा को बरकरार रखा, 20 साल की जेल की सजा को घटाकर 14 साल कर दिया।

Shivam
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दिल्ली हाईकोर्ट ने छह वर्षीय बच्ची से यौन उत्पीड़न मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए आरोपी की 20 साल की सजा घटाकर 14 साल कर दी। - राजेंद्र शर्मा बनाम राज्य (Govt of NCT) दिल्ली

दिल्ली उच्च न्यायालय ने नाबालिग पर हमले के मामले में POCSO की सजा को बरकरार रखा, 20 साल की जेल की सजा को घटाकर 14 साल कर दिया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में छह साल की बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए आरोपी की सजा में आंशिक राहत दी है। अदालत ने कहा कि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद और लगातार एक जैसी रही, इसलिए केवल जांच में कुछ तकनीकी कमियों के आधार पर पूरे मामले को खारिज नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला जनवरी 2013 का है। अभियोजन के अनुसार, आरोपी राजेंद्र शर्मा दक्षिण दिल्ली के संगम विहार इलाके में पीड़िता के घर में किराएदार था। आरोप था कि उसने छह वर्षीय बच्ची के साथ बाथरूम के पास यौन उत्पीड़न किया। बच्ची ने बाद में अपनी नानी को घटना की जानकारी दी, जिसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज हुई।

ट्रायल कोर्ट ने 2020 में आरोपी को IPC की धारा 376(2)(f) और POCSO Act की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए 20 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी। इसी फैसले को आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

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अपील में आरोपी की ओर से कहा गया कि पीड़िता और उसकी नानी के बयानों में कई विरोधाभास हैं। बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि किराए के विवाद के कारण आरोपी को झूठा फंसाया गया। अदालत के सामने यह तर्क भी रखा गया कि मेडिकल और फॉरेंसिक सबूतों की जब्ती प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं, इसलिए अभियोजन की कहानी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने फैसले में कहा कि पीड़िता ने FIR, मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयान और अदालत में अपनी गवाही में लगातार आरोपी के खिलाफ समान आरोप लगाए। अदालत ने माना कि घटना की सही जगह को लेकर मामूली अंतर था, लेकिन इससे पूरे मामले की विश्वसनीयता प्रभावित नहीं होती।

अदालत ने कहा, “पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और भरोसेमंद है। केवल वैज्ञानिक साक्ष्य में कमियां होने से अभियोजन का पूरा मामला कमजोर नहीं हो जाता।”

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि POCSO कानून के तहत “penetrative sexual assault” साबित करने के लिए हाइमन का फटना जरूरी नहीं है। अदालत ने कहा कि “किसी भी स्तर तक प्रवेश” कानून के तहत अपराध माना जाता है।

हालांकि, कोर्ट ने जांच एजेंसी द्वारा जब्त किए गए नमूनों और कपड़ों की प्रक्रिया को संतोषजनक नहीं माना। अदालत ने कहा कि फॉरेंसिक रिपोर्ट पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि जब्ती प्रक्रिया ठीक से साबित नहीं हुई। इसके बावजूद अदालत ने माना कि पीड़िता और उसकी नानी की गवाही पर्याप्त है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा में बदलाव किया। अदालत ने कहा कि जिस समय घटना हुई थी, उस समय लागू कानून के अनुसार ट्रायल कोर्ट अधिकतम 14 साल की निश्चित अवधि की सजा ही दे सकता था। इसलिए 20 साल की सजा कानूनी रूप से सही नहीं थी।

इसके बाद अदालत ने आरोपी की सजा 20 साल से घटाकर 14 साल की कठोर कैद कर दी। बाकी सभी निष्कर्ष और दोषसिद्धि यथावत रखी गई।

Case Details

Case Title: Rajender Sharma v. The State (Govt of NCT) Delhi

Case Number: CRL.A. 610/2020

Judge: Justice Chandrasekharan Sudha

Decision Date: May 5, 2026

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