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दिल्ली हाईकोर्ट ने 30 साल पुराने किरायेदार की बेदखली को सही ठहराया, रिवीजन याचिका खारिज

Shivam
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सतीश कुमार गुप्ता बनाम सुशील कुमार लूम्बा - दिल्ली उच्च न्यायालय ने बेदखली के आदेश को बरकरार रखा, कहा कि दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत मकान मालिक की व्यावसायिक आवश्यकता वास्तविक है, और पुनरीक्षण की गुंजाइश को सीमित किया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 30 साल पुराने किरायेदार की बेदखली को सही ठहराया, रिवीजन याचिका खारिज

दिल्ली हाईकोर्ट ने किरायेदार–मकान मालिक विवाद से जुड़ी एक अहम याचिका पर फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि अगर मकान मालिक की जरूरत वास्तविक और ईमानदार (बोना फाइड) हो, तो किरायेदार को सिर्फ शक या आरोप के आधार पर मुकदमे का लंबा ट्रायल नहीं दिया जा सकता। अदालत ने निचली अदालत के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया। यह फैसला 7 जनवरी 2026 को सुरक्षित रखे गए निर्णय के बाद सुनाया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला दिल्ली के आदर्श नगर स्थित एक दुकान से जुड़ा है, जहां याचिकाकर्ता सतीश कुमार गुप्ता पिछले 30 वर्षों से किरायेदार के रूप में काम कर रहे थे। दुकान का मासिक किराया ₹702 बताया गया।

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मकान मालिक सुषील कुमार लूंबा ने वर्ष 2016 में दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 की धारा 14(1)(e) के तहत याचिका दाखिल की। उनका कहना था कि उन्हें यह दुकान अपने स्वयं के व्यवसाय के लिए चाहिए क्योंकि उनकी आय का कोई अन्य स्थायी साधन नहीं है।

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किरायेदार की दलीलें

किरायेदार ने अदालत के सामने तर्क दिया कि मकान मालिक की जरूरत वास्तविक नहीं है। उनका कहना था कि उसी इमारत में दुकान नंबर 1 और 3 पहले से उपलब्ध थीं, जिन्हें जानबूझकर छिपाया गया। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि मकान मालिक अब भी ऑक्सीजन सिलेंडर की आपूर्ति का व्यवसाय चला रहे हैं और केवल अधिक किराया पाने के लिए उन्हें बेदखल करना चाहते हैं। उनकी दलील थी कि इस तरह के तथ्यों पर कम से कम ट्रायल की अनुमति दी जानी चाहिए थी।

मकान मालिक का पक्ष

मकान मालिक की ओर से कहा गया कि किरायेदार ने भ्रामक तथ्यों के आधार पर रिवीजन याचिका दाखिल की है। उन्होंने बताया कि ऑक्सीजन सिलेंडर का व्यवसाय 2016 में ही ट्रांसफर कर दिया गया था।

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दुकान नंबर 1 और 3 के संबंध में यह स्पष्ट किया गया कि एक दुकान उनकी पत्नी द्वारा बुटीक के रूप में इस्तेमाल की जा रही है, जबकि दूसरी पहले से किराये पर दी जा चुकी थी।

उनका कहना था कि कानून के अनुसार मकान मालिक ही अपनी जरूरत का सबसे अच्छा निर्णयकर्ता होता है।

अदालत की टिप्पणियां

मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश अनूप जयराम भम्भानी ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि मकान मालिक–किरायेदार संबंध को लेकर कोई विवाद नहीं है।

अदालत ने कहा,

“रेंट कंट्रोलर द्वारा दिए गए निष्कर्ष दस्तावेजों और स्वीकृत तथ्यों पर आधारित हैं और उन्हें मनमाना नहीं कहा जा सकता।”

हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि रिवीजन अधिकार क्षेत्र में अदालत तथ्यों की दोबारा जांच नहीं कर सकती, जब तक आदेश पूरी तरह अवैध या असंगत न हो।

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अंतिम फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने रिवीजन याचिका को खारिज करते हुए कहा कि निचली अदालत का आदेश कानून के अनुरूप है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किरायेदार को ट्रायल की अनुमति देने लायक कोई ठोस विवादित मुद्दा नहीं बनता।

इसके साथ ही यह भी कहा गया कि छह महीने की वैधानिक अवधि समाप्त हो चुकी है, इसलिए मकान मालिक अब बेदखली आदेश को तुरंत लागू करने के लिए स्वतंत्र है।

Case Title:- Satish Kumar Gupta v. Sushil Kumar Loomba

Case Number: RC.REV. 300/2024

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