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दिल्ली हाईकोर्ट ने रोसलैंड बिल्डटेक की सिविल याचिका खारिज की, कहा- IBC मामलों में NCLT का ही अधिकार

Shivam
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने रोज़लैंड बिल्डटेक का दीवानी मुकदमा खारिज करते हुए कहा कि 80 करोड़ रुपये के ऋण से संबंधित दिवालियापन विवाद का निपटारा राष्ट्रीय न्यायिक परिषद (NCLT) द्वारा अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संहिता (IBC) के तहत किया जाना चाहिए। - रोज़लैंड बिल्डटेक प्राइवेट लिमिटेड बनाम विहान 43 रियल्टी प्राइवेट लिमिटेड और अन्य।

दिल्ली हाईकोर्ट ने रोसलैंड बिल्डटेक की सिविल याचिका खारिज की, कहा- IBC मामलों में NCLT का ही अधिकार

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया कि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) से जुड़े विवादों को सुलझाने का अधिकार सिविल कोर्ट का नहीं, बल्कि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) का है। कोर्ट ने रोसलैंड बिल्डटेक प्राइवेट लिमिटेड की उस सिविल याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें कंपनी ने अपने खिलाफ शुरू की गई दिवाला कार्यवाही को चुनौती दी थी

मामले की पृष्ठभूमि

रोसलैंड बिल्डटेक ने वर्ष 2006 में एक वित्तीय संस्थान से ₹80 करोड़ का टर्म लोन लिया था। कंपनी का दावा था कि यह पूरा कर्ज चुका दिया गया है और अब कोई वैध बकाया नहीं बचता।

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कंपनी ने यह भी आरोप लगाया कि बाद में जिस बिज़नेस ट्रांसफर एग्रीमेंट (BTA) के आधार पर कर्ज को एक अन्य कंपनी को सौंपा गया, वह दस्तावेज़ जाली और अवैध है। इसी आधार पर रोसलैंड ने सिविल कोर्ट में यह घोषणा (डिक्लेरेशन) मांगी कि न तो कोई कर्ज शेष है और न ही दिवाला कार्यवाही शुरू की जा सकती है।

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इस बीच, कथित असाइनी कंपनी ने रोसलैंड के खिलाफ IBC की धारा 7 के तहत National Company Law Tribunal में दिवाला याचिका दायर कर दी।

कोर्ट में क्या सवाल था

मुख्य सवाल यह था कि क्या सिविल कोर्ट इस बात की जांच कर सकती है कि कर्ज वास्तव में बकाया है या नहीं, या फिर यह तय करना पूरी तरह NCLT के अधिकार क्षेत्र में आता है?

कोर्ट की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने सुनवाई के दौरान कहा कि IBC एक संपूर्ण और विशेष कानून है, जो दिवाला और दिवालियापन से जुड़े सभी विवादों के लिए एक अलग मंच तय करता है।

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कोर्ट ने टिप्पणी की:

“IBC का उद्देश्य यही है कि दिवाला से जुड़े सभी विवाद एक ही मंच पर, समयबद्ध तरीके से तय हों। यदि ऐसे मामलों को सिविल कोर्ट में चलने दिया गया, तो पूरी प्रक्रिया बिखर जाएगी।”

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि IBC की धारा 63 और 231 सिविल कोर्ट के अधिकार को साफ तौर पर रोकती हैं, जब मामला NCLT के अधिकार क्षेत्र में आता हो।

फ्रॉड और जालसाजी के आरोप पर कोर्ट का रुख

रोसलैंड ने दलील दी थी कि BTA जाली है और धोखाधड़ी से बनाया गया है, इसलिए सिविल कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए।

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इस पर कोर्ट ने कहा कि:

“IBC के तहत NCLT को यह शक्ति दी गई है कि वह यह भी जांच कर सके कि दिवाला याचिका किसी धोखाधड़ी या गलत मंशा से तो दाखिल नहीं की गई है।”

कोर्ट ने याद दिलाया कि IBC की धारा 65 और 75 NCLT को यह अधिकार देती हैं कि वह झूठे या भ्रामक दस्तावेज़ों की जांच करे और ज़रूरत पड़ने पर जुर्माना भी लगाए।

अंतरिम राहत की अर्जी भी बेअसर

रोसलैंड ने सिविल कोर्ट से यह भी मांग की थी कि NCLT में चल रही दिवाला कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाई जाए।

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लेकिन जब मुख्य सिविल याचिका ही कानूनन असंवैधानिक पाई गई, तो कोर्ट ने कहा कि अंतरिम राहत की मांग अपने आप समाप्त हो जाती है।

अंतिम फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि:

• रोसलैंड बिल्डटेक की सिविल याचिका IBC के प्रावधानों के कारण विचारणीय नहीं है

• सिविल कोर्ट में दायर वाद को Order 7 Rule 11 CPC के तहत खारिज किया जाता है

• अंतरिम राहत की अर्जी भी निष्प्रभावी मानी जाएगी

इस तरह, कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि दिवाला से जुड़े सभी सवाल चाहे वे कर्ज के अस्तित्व से जुड़े हों या दस्तावेज़ों की वैधता से अब NCLT ही तय करेगा।

Case Title: Roseland Buildtech Pvt. Ltd. v. Vihaan 43 Realty Pvt. Ltd. & Ors.

Case Number: C.S. (Comm.) 812/2025

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