Logo

दिल्ली हाई कोर्ट: POCSO मामलों में बच्चों को बार-बार कोर्ट बुलाना गलत, ट्रायल कोर्ट को दिए महत्वपूर्ण निर्देश

Shivam
Add Court Book as a preferred source on Google

दिल्ली हाई कोर्ट: POCSO मामलों में बच्चों को बार-बार कोर्ट बुलाना गलत, ट्रायल कोर्ट को दिए महत्वपूर्ण निर्देश

दिल्ली हाई कोर्ट ने POCSO मामलों में बच्चे पीड़ितों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं। अदालत ने कहा कि ट्रायल प्रक्रिया ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे पीड़ित बच्चों को बार-बार अदालत में आकर मानसिक आघात झेलना पड़े।

न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्णा कांत शर्मा की एकल पीठ ने कहा कि अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों की गवाही समयबद्ध तरीके से रिकॉर्ड हो और उन्हें अनावश्यक रूप से बार-बार अदालत में उपस्थित होने के लिए मजबूर न किया जाए।

यह निर्णय एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि POCSO मामले में तीन नाबालिग पीड़िताओं को कई बार अदालत में बुलाया गया, जिससे उन्हें मानसिक तनाव हुआ।

Read also:- ‘गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार’ - सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा मामले में दी जीवनरक्षक उपचार हटाने की अनुमति

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

मामले की पृष्ठभूमि

मामले की शुरुआत अगस्त 2022 में हुई जब तीन नाबालिग लड़कियों के लापता होने की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई गई। बाद में पुलिस ने उन्हें बरामद किया और जांच के दौरान लड़कियों ने आरोप लगाया कि उन्हें दो दिनों तक कई आरोपियों द्वारा यौन उत्पीड़न और धमकी का सामना करना पड़ा।

इसके बाद FIR में IPC की कई गंभीर धाराएँ और POCSO Act की धारा 6 जोड़ी गईं। मामले की जांच पूरी होने के बाद आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई और ट्रायल शुरू हुआ।

याचिका में यह भी बताया गया कि पीड़ित बच्चियों को गवाही के लिए कई बार अदालत में बुलाया गया - एक पीड़िता को नौ बार, दूसरी को चार बार और तीसरी को छह बार। इससे बच्चों को गंभीर मानसिक तनाव हुआ।

Read also:- बॉम्बे हाईकोर्ट ने “ELDER” ट्रेडमार्क विवाद में एक्स-पार्टी अंतरिम आदेश रद्द किया, तथ्य छिपाने पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि POCSO Act का उद्देश्य बच्चों के लिए child-friendly न्यायिक प्रक्रिया सुनिश्चित करना है।

लेकिन इस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा बार-बार समन जारी किए जाने से बच्चों को अनावश्यक मानसिक पीड़ा हुई।

यह भी आरोप लगाया गया कि कई बार आरोपियों द्वारा जमानत याचिकाएँ दायर और वापस ली गईं, जिसके कारण पीड़ितों को बार-बार अदालत में उपस्थित होना पड़ा।

अमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) ने भी अदालत को सुझाव दिया कि POCSO मामलों में बच्चों की गवाही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या Vulnerable Witness Deposition Centres से रिकॉर्ड की जानी चाहिए ताकि उन्हें अदालत के माहौल का सामना न करना पड़े।

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली में “vulnerable witnesses” यानी संवेदनशील गवाहों - विशेष रूप से यौन अपराधों के पीड़ित बच्चों - को विशेष संरक्षण की आवश्यकता होती है।

Read also:- बेटियों का हित सर्वोपरि: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने माँ के पक्ष में दिया कस्टडी फैसला

अदालत ने कहा:

“POCSO Act का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे को अदालत में बार-बार उपस्थित होने के लिए मजबूर न किया जाए और ट्रायल प्रक्रिया उसके लिए अतिरिक्त मानसिक आघात का कारण न बने।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि:

• बच्चे की गवाही जल्द से जल्द रिकॉर्ड की जानी चाहिए।

• अनावश्यक स्थगन (adjournment) से बचना चाहिए।

• जरूरत पड़ने पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से गवाही रिकॉर्ड की जा सकती है।

• जमानत सुनवाई के दौरान पीड़ित की बार-बार उपस्थिति आवश्यक नहीं है।

अदालत ने कहा कि एक बार पीड़ित की राय रिकॉर्ड हो जाने के बाद जमानत सुनवाई में उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए।

Read also:- डिजिटल गोल्ड ऐप ‘Jar’ पर FIR रद्द करने से कर्नाटक हाईकोर्ट का इनकार, कहा – निवेशकों की शिकायतों के बीच जांच जरूरी

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि:

• POCSO मामलों में बच्चों को बार-बार कोर्ट में बुलाना कानून की भावना के खिलाफ है।

• ट्रायल कोर्ट को चाहिए कि गवाही के लिए लगातार तारीखें तय करें ताकि बयान जल्दी रिकॉर्ड हो सके।

• जहां आवश्यक हो, बच्चों की गवाही वीडियो लिंक या अन्य सुरक्षित तकनीकी माध्यमों से रिकॉर्ड की जा सकती है।

अदालत ने अपने निर्णय की प्रति दिल्ली के सभी ट्रायल कोर्ट और विशेष अदालतों को भेजने का निर्देश भी दिया ताकि भविष्य में इन सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।

Case Title: Minor Child K & Ors. v. State (NCT of Delhi) & Ors.

Case Number: CRL.M.C. 3880/2025

Decision Date: 11 March 2026

Download Judgment

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates