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UPSC अभियोजक भर्ती पर दिल्ली हाई कोर्ट सख्त: अनुभव की कमी पर याचिका खारिज, CAT का फैसला बरकरार

Vivek G.
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अनंत कुमार राव बनाम संघ लोक सेवा आयोग और अन्य। दिल्ली हाईकोर्ट ने UPSC अभियोजक भर्ती में अनुभव की कमी पर याचिका खारिज की, CAT का आदेश बरकरार रखा।

UPSC अभियोजक भर्ती पर दिल्ली हाई कोर्ट सख्त: अनुभव की कमी पर याचिका खारिज, CAT का फैसला बरकरार

दिल्ली हाईकोर्ट ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा एसएफआईओ (SFIO) में अभियोजक (Prosecutor) पद के लिए एक अभ्यर्थी की उम्मीदवारी रद्द किए जाने के फैसले को सही ठहराया है। अदालत ने साफ कहा कि भर्ती प्रक्रिया में तय शर्तों और कट-ऑफ तारीख का सख्ती से पालन जरूरी है।

13 फरवरी 2026 को सुनाए गए इस निर्णय में न्यायमूर्ति अनिल क्षेतरपाल और न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

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मामले की पृष्ठभूमि

मामला अनंत कुमार राव द्वारा दायर रिट याचिका से जुड़ा है। उन्होंने UPSC के विज्ञापन संख्या 18/2022 के तहत गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO), कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय में अभियोजक के 12 पदों के लिए आवेदन किया था।

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विज्ञापन में स्पष्ट शर्त थी कि पाँच वर्षीय इंटीग्रेटेड लॉ डिग्री धारकों के लिए सरकारी संगठन में दो वर्ष का अनुभव आवश्यक होगा, जिसमें मुकदमों और अदालत संबंधी कार्यों का अनुभव शामिल हो।

याचिकाकर्ता ने अपनी ऑनलाइन भर्ती आवेदन (ORA) में केवल एक निजी कंपनी—विलार्ड एडवाइजरी प्रा. लि.-में कार्य अनुभव दर्शाया। उन्होंने बताया कि वे अनुबंध ड्राफ्टिंग, कॉर्पोरेट अनुपालन और विभिन्न कानूनी दस्तावेजों के मसौदे तैयार करने का काम करते थे।

UPSC ने उनकी उम्मीदवारी यह कहते हुए खारिज कर दी कि उनके पास निर्धारित अनुभव नहीं है। बाद में उन्होंने अन्य अनुभव प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए, लेकिन वे या तो ORA में दर्ज नहीं थे, या कट-ऑफ तारीख (13.10.2022) के बाद के थे।

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याचिकाकर्ता की दलीलें

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वे अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग से हैं, इसलिए उन्हें अनुभव में छूट मिलनी चाहिए थी।

उनके वकील ने अदालत से कहा, “उम्मीदवार ने पर्याप्त कानूनी कार्य किया है। केवल तकनीकी आधार पर उन्हें बाहर नहीं किया जाना चाहिए।”

यह भी तर्क दिया गया कि अभियोजक पद के लिए हर हाल में अदालत में पेशी जरूरी नहीं होती, और ORA में हुई चूक को गंभीर आधार नहीं माना जाना चाहिए।

अदालत की टिप्पणी

पीठ ने मामले को विस्तार से सुना। अदालत ने भर्ती विज्ञापन में वर्णित कर्तव्यों का जिक्र किया-जिनमें अदालत में अभियोजन दायर करना, मामलों की प्रगति पर नजर रखना और सरकारी वकीलों के साथ समन्वय शामिल है।

अदालत ने कहा, “भर्ती प्रक्रिया में पात्रता का आकलन कट-ऑफ तारीख के आधार पर ही किया जाता है। बाद में दिए गए प्रमाणपत्रों से पात्रता नहीं सुधारी जा सकती।”

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Bedanga Talukdar बनाम सैफुदुल्लाह खान का हवाला देते हुए कहा कि चयन प्रक्रिया का पालन सख्ती से होना चाहिए और बिना सार्वजनिक सूचना के शर्तों में ढील नहीं दी जा सकती।

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न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि विज्ञापन में दी गई छूट का प्रावधान “अधिकार” नहीं, बल्कि UPSC का “विवेकाधिकार” है। केवल ST वर्ग से होने के आधार पर स्वतः छूट नहीं मिल सकती।

CAT का आदेश और हाईकोर्ट का रुख

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) ने पहले ही याचिका खारिज कर दी थी। हालांकि कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता को चयन प्रक्रिया में अस्थायी रूप से शामिल होने की अनुमति दी गई थी, लेकिन परिणाम सीलबंद लिफाफे में रखा गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि CAT का निर्णय “तर्कसंगत और कानून के अनुरूप” है।

पीठ ने कहा, “न तो UPSC की कार्रवाई मनमानी है और न ही इसमें कोई कानूनी त्रुटि दिखती है। न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित है और अदालत चयन एजेंसी के निर्णय की जगह अपना मत नहीं थोप सकती।”

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अंतिम निर्णय

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी। साथ ही, लंबित आवेदन भी निस्तारित कर दिए गए।

अदालत का फैसला स्पष्ट संदेश देता है-सरकारी भर्तियों में निर्धारित नियम और समयसीमा सर्वोपरि हैं।

Case Title: Anant Kumar Rao vs Union Public Service Commission & Ors.

Case No.: W.P.(C) 15303/2025

Decision Date: 13 February 2026

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