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डिप्लोमा अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार फार्मासिस्ट भर्ती नियमों को सही ठहराया, याचिकाएं खारिज

Vivek G.
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मोहम्मद फिरोज मंसूरी और अन्य बनाम बिहार राज्य, सुप्रीम कोर्ट ने बिहार फार्मासिस्ट भर्ती में डिप्लोमा अनिवार्य रखने को सही ठहराया, बी.फार्मा धारकों की याचिका खारिज।

डिप्लोमा अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार फार्मासिस्ट भर्ती नियमों को सही ठहराया, याचिकाएं खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में फार्मासिस्ट भर्ती को लेकर चल रहे लंबे विवाद पर अंतिम मुहर लगा दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा डिप्लोमा इन फार्मेसी को अनिवार्य योग्यता बनाए रखना संविधान के खिलाफ नहीं है। इस फैसले से बी.फार्मा और एम.फार्मा डिग्रीधारकों को बड़ा झटका लगा है, जो बिना डिप्लोमा के सरकारी नौकरी की मांग कर रहे थे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बिहार फार्मासिस्ट कैडर नियम, 2014 और उसके 2024 संशोधन से जुड़ा है। नियमों के अनुसार, फार्मासिस्ट पद पर नियुक्ति के लिए डिप्लोमा इन फार्मेसी अनिवार्य योग्यता तय की गई है।

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हालांकि नियमों में यह भी कहा गया था कि बी.फार्मा और एम.फार्मा धारक आवेदन कर सकते हैं, लेकिन शर्त यह थी कि उनके पास डिप्लोमा भी होना चाहिए। इसी शर्त को चुनौती देते हुए कई अभ्यर्थी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।

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याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के अनुसार डिग्रीधारी भी फार्मासिस्ट बनने के योग्य हैं, इसलिए राज्य सरकार उन्हें बाहर नहीं कर सकती।

कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा-

“राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह अपने प्रशासनिक और जनस्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के अनुसार न्यूनतम योग्यता तय करे।”

कोर्ट ने कहा कि फार्मेसी एक्ट, 1948 और फार्मेसी प्रैक्टिस रेगुलेशन, 2015 केवल यह तय करते हैं कि कौन फार्मासिस्ट के रूप में पंजीकृत हो सकता है, लेकिन यह नहीं बताते कि सरकारी नौकरी में किसे नियुक्त किया जाए।

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पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि-

• डिप्लोमा और डिग्री अलग-अलग प्रकृति की योग्यताएं हैं

• डिप्लोमा पाठ्यक्रम में अस्पताल आधारित व्यावहारिक प्रशिक्षण अधिक होता है

• राज्य सरकार को यह तय करने का अधिकार है कि अस्पतालों के लिए किस तरह का प्रशिक्षण उपयुक्त है

डिग्री धारकों की दलील खारिज

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि बी.फार्मा उच्च योग्यता है, इसलिए उन्हें बाहर करना भेदभाव है।

लेकिन कोर्ट ने कहा-

“केवल उच्च योग्यता होना अपने आप में नियुक्ति का अधिकार नहीं देता।”

अदालत ने यह भी माना कि डिप्लोमा धारकों के लिए रोजगार के अवसर सीमित होते हैं, जबकि डिग्री धारकों के पास इंडस्ट्री और अन्य क्षेत्रों में विकल्प मौजूद रहते हैं।

राज्य सरकार का पक्ष मजबूत

राज्य सरकार ने दलील दी कि डिप्लोमा पाठ्यक्रम में 500 घंटे का अनिवार्य अस्पताल प्रशिक्षण होता है, जो बी.फार्मा में नहीं है। इसलिए अस्पतालों में कार्य के लिए डिप्लोमा धारक अधिक उपयुक्त हैं।

कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि यह नीति-निर्धारण का विषय है, जिसमें न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

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अदालत का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि-

• बिहार फार्मासिस्ट कैडर नियम संविधान सम्मत हैं

• डिप्लोमा को अनिवार्य करना मनमाना नहीं है

• बी.फार्मा/एम.फार्मा धारकों को कोई मौलिक अधिकार नहीं है कि उन्हें बिना डिप्लोमा भर्ती किया जाए

इसी के साथ सभी अपीलें खारिज कर दी गईं और हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा गया।

Case Title: Md. Firoz Mansuri & Ors. vs State of Bihar

Case No.: SLP (C) No. 12236 of 2025

Decision Date: 16 January 2026

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