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सिर्फ डायरेक्टर होना या बोर्ड रेजोल्यूशन साइन करना, आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए पर्याप्त नहीं: सर्वोच्च न्यायालय

Vivek G.
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल डायरेक्टर होने से आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं होती, और पर्याप्त आरोप न होने पर सरोज पांडेय के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी। - सरोज पांडे बनाम Govt. of NCT of दिल्ली & अन्य।

सिर्फ डायरेक्टर होना या बोर्ड रेजोल्यूशन साइन करना, आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए पर्याप्त नहीं: सर्वोच्च न्यायालय

नई दिल्ली में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया कि किसी कंपनी का डायरेक्टर होना मात्र, उसे हर आपराधिक जिम्मेदारी के लिए स्वतः उत्तरदायी नहीं बनाता। अदालत ने सरोज पांडेय के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 (चेक बाउंस)और 142 से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार, एक कंपनी प्रोजटेक इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड ने लोहे और स्टील की सप्लाई के बदले तीन चेक जारी किए थे, जो बाद में “सिग्नेचर डिफर” और अन्य तकनीकी कारणों से बाउंस हो गए।

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इसके बाद शिकायतकर्ता ने कानूनी नोटिस भेजा और मामला अदालत में पहुंचा। मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने समन जारी किया, जिसे सेशन कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा।

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सरोज पांडेय, जो कंपनी की डायरेक्टर थीं, ने इन आदेशों को चुनौती दी।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजय करोल की पीठ ने कहा कि:

“सिर्फ डायरेक्टर होने के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक यह स्पष्ट न हो कि वह कंपनी के रोज़मर्रा के कामकाज के लिए जिम्मेदार था।”

अदालत ने यह भी देखा कि शिकायत में कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया गया कि सरोज पांडेय कंपनी के दैनिक संचालन में सक्रिय रूप से शामिल थीं।

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बेंच ने कहा:

“बोर्ड रिज़ॉल्यूशन पर हस्ताक्षर करना यह साबित नहीं करता कि संबंधित व्यक्ति कंपनी के हर दिन के कामकाज से जुड़ा हुआ था।”

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 141 के तहत किसी डायरेक्टर को जिम्मेदार ठहराने के लिए यह आवश्यक है कि:

• वह व्यक्ति कंपनी के व्यवसाय के संचालन के लिए जिम्मेदार हो

• और यह तथ्य शिकायत में स्पष्ट रूप से उल्लेखित हो

अदालत ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “सिर्फ पद (designation) के आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी नहीं तय की जा सकती।”

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट की उस टिप्पणी पर भी असहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि रिवीजन के बाद धारा 482 CrPC के तहत याचिका सीमित हो जाती है।

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बेंच ने स्पष्ट किया:

“हाई कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां (inherent powers) हमेशा बनी रहती हैं और न्याय के हित में उनका उपयोग किया जा सकता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि:

• शिकायत में सरोज पांडेय की भूमिका को लेकर कोई ठोस आरोप नहीं था

• केवल बोर्ड रिज़ॉल्यूशन पर हस्ताक्षर करना पर्याप्त नहीं है

• उनके खिलाफ मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा

इसी आधार पर अदालत ने सरोज पांडेय के खिलाफ जारी समन और पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।

बेंच ने स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल अपीलकर्ता तक सीमित रहेगा और अन्य सह-आरोपियों के ट्रायल पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

Case Details

Case Title: Saroj Pandey vs Govt. of NCT of Delhi & Ors.

Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 21322 of 2025

Judges: Justice Sanjay Karol, Justice Augustine George Masih

Decision Date: April 7, 2026

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