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ईडी की गिरफ्तारी वैध: रियल एस्टेट कंपनी के प्रमोटरों की याचिकाएं हाईकोर्ट ने खारिज कीं

Shivam
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पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने ईडी की कार्रवाई को रद्द करने से इनकार कर दिया और होमबायर फंड से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में रामप्रस्था के निदेशकों की गिरफ्तारी को वैध ठहराया।

ईडी की गिरफ्तारी वैध: रियल एस्टेट कंपनी के प्रमोटरों की याचिकाएं हाईकोर्ट ने खारिज कीं

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने रियल एस्टेट कंपनी रामप्रस्थ प्रमोटर्स एंड डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी राहत की उम्मीद लगाए बैठे आरोपियों को झटका दिया है। अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा की गई गिरफ्तारी को वैध ठहराते हुए दोनों प्रमोटर-डायरेक्टर्स की याचिकाएं खारिज कर दीं।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता अरविंद वालिया और संदीप यादव कंपनी के प्रमोटर और निदेशक हैं। ईडी का आरोप था कि कंपनी ने गुरुग्राम में कई हाउसिंग प्रोजेक्ट्स के नाम पर हजारों होमबायर्स से लगभग ₹1,100 करोड़ रुपये जुटाए, लेकिन वर्षों बीतने के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों को न तो मकान मिला और न ही प्लॉट का कब्जा।

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ईडी के अनुसार, होमबायर्स से लिया गया पैसा अलग-अलग ग्रुप कंपनियों और अन्य संस्थाओं में ट्रांसफर किया गया। इन पैसों का इस्तेमाल जमीन खरीदने और निजी लाभ के लिए किया गया, जिससे परियोजनाएं अधूरी रह गईं। इसी आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया गया।

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गिरफ्तारी को लेकर विवाद

दोनों याचिकाकर्ताओं को 21 जुलाई 2025 को ईडी ने गिरफ्तार किया था। उन्होंने हाईकोर्ट में दलील दी कि उनकी गिरफ्तारी अवैध है क्योंकि जिस दिन उन्हें पकड़ा गया, उस समय उनके खिलाफ दर्ज कुछ एफआईआर या तो समझौते के कारण खत्म हो चुकी थीं या उन पर अदालत की रोक लगी हुई थी।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि ईडी ने गिरफ्तारी से पहले जरूरी तथ्यों और उनके पक्ष में मौजूद दस्तावेजों पर ध्यान नहीं दिया। उनका तर्क था कि गिरफ्तारी “जल्दबाजी” में की गई और कानून में तय प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।

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अदालत की टिप्पणियां

जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने इन दलीलों से सहमति नहीं जताई। अदालत ने कहा कि भले ही कुछ मामलों में बाद में समझौता हुआ हो या रद्दीकरण रिपोर्ट दाखिल हुई हो, लेकिन जब जांच शुरू हुई और ईसीआईआर (ECIR) दर्ज की गई, तब पर्याप्त सामग्री मौजूद थी।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा,

“ईसीआईआर प्रवर्तन निदेशालय का आंतरिक दस्तावेज है। इसमें बाद में अन्य एफआईआर जोड़ी जाएं, इससे पहले की गई गिरफ्तारी अवैध नहीं हो जाती।”

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कोर्ट ने यह भी माना कि ईडी ने गिरफ्तारी के समय ‘गिरफ्तारी के आधार’ और ‘विश्वास के कारण’ आरोपियों को उपलब्ध कराए और इन्हें विधि अनुसार प्राधिकरण को भी भेजा गया।

अंतिम निर्णय

सभी दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ईडी द्वारा की गई गिरफ्तारी में कोई कानूनी खामी नहीं है। अदालत ने दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं और कहा कि गिरफ्तारी तथा बाद की रिमांड प्रक्रिया कानून के अनुरूप है।

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