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दिल्ली उच्च न्यायालय ने 23 साल पुराने फर्जी समन मामले में अभियोजक के खिलाफ लगे आरोपों को खारिज कर दिया।

CB News Desk
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नरेंद्र सिंह बनाम राज्य - दिल्ली उच्च न्यायालय ने 23 साल पुराने मामले का अंत किया, तलाक के मामले में समन तामील में हेराफेरी करने के आरोपी प्रक्रिया सेवक के खिलाफ आरोपों को खारिज किया।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 23 साल पुराने फर्जी समन मामले में अभियोजक के खिलाफ लगे आरोपों को खारिज कर दिया।

करीब दो दशक पुराने आपराधिक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए एक प्रोसेस सर्वर के खिलाफ झूठी गवाही और फर्जी साक्ष्य गढ़ने के आरोपों को खत्म कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि जब कथित फर्जी दस्तावेज़ ही रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है, तो आपराधिक मुकदमा चलाना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2003 में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता इंदु ने आरोप लगाया था कि उनके पति पंकज मल्होत्रा ने जयपुर कोर्ट से उनकी जानकारी के बिना एकतरफा तलाक की डिक्री हासिल की। बाद में आरोप लगे कि समन की सेवा दिल्ली में दिखाने के लिए प्रोसेस सर्वर नरेंद्र सिंह ने झूठी सर्विस रिपोर्ट तैयार की।

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जांच के दौरान यह दावा किया गया कि समन पर “साकेत” शब्द बाद में जोड़ा गया, ताकि स्वयं को ही समन सर्व करने की एंट्री दिखाई जा सके। इसी आधार पर नरेंद्र सिंह पर IPC की धारा 193 के तहत मुकदमा चलाने की कोशिश की गई।

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मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने 2012 में नरेंद्र सिंह को यह कहते हुए डिस्चार्ज कर दिया था कि मूल समन कभी जब्त ही नहीं किया गया। न तो हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट थी, न ही कोई पुख्ता सबूत।

हालांकि, सत्र न्यायालय ने 2013 में इस डिस्चार्ज आदेश को पलटते हुए आरोप तय करने का निर्देश दे दिया। इसी आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

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हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां

जस्टिस अमित महाजन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि चार्ज फ्रेम करने के स्तर पर भी “गंभीर संदेह” होना जरूरी है, केवल शक काफी नहीं है।

अदालत ने टिप्पणी की,

“जब कथित फर्जी दस्तावेज़ ही अभियोजन के पास नहीं है, तो झूठा साक्ष्य गढ़ने का आरोप अपने आप कमजोर पड़ जाता है।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विभागीय जांच में दोषी ठहराया जाना आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बन सकता, क्योंकि दोनों की कसौटी अलग होती है।

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हाईकोर्ट ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि मुख्य आरोपी पंकज मल्होत्रा को पहले ही बलात्कार और धोखे के आरोपों से बरी किया जा चुका है। उस फैसले में ट्रायल कोर्ट ने माना था कि शिकायतकर्ता ने समन पर अपने हस्ताक्षर स्वीकार किए थे और वह तलाक की कार्यवाही से अवगत थीं।

कोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों में प्रोसेस सर्वर के खिलाफ मुकदमा जारी रखना उचित नहीं है।

अदालत का अंतिम फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया डिस्चार्ज आदेश बहाल कर दिया। इसके साथ ही नरेंद्र सिंह के खिलाफ IPC 193 के तहत चल रही सभी कार्यवाहियों पर विराम लग गया।

अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि,

“प्राथमिक सबूत के अभाव में आपराधिक ट्रायल जारी रखना कानून और न्याय दोनों के खिलाफ होगा।”

Case Title: Narender Singh v. State

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