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विदेशी आर्बिट्रेशन अवॉर्ड पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर: निवेशकों को एग्ज़िट न देने पर प्रमोटर्स पर भारी जिम्मेदारी

Vivek G.
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सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को लागू करने का आदेश बरकरार रखते हुए कहा कि मामूली कानूनी आपत्तियों से ऐसे अवॉर्ड रोके नहीं जा सकते। - नागराज वी. मैलैंडला बनाम पीआई अपॉर्चुनिटीज फंड-आई और अन्य।

विदेशी आर्बिट्रेशन अवॉर्ड पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर: निवेशकों को एग्ज़िट न देने पर प्रमोटर्स पर भारी जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह साफ कर दिया कि विदेशी आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को भारत में लागू करने से केवल सीमित परिस्थितियों में ही रोका जा सकता है। यह मामला एक कंपनी के प्रमोटर्स द्वारा निवेशकों को समय पर “एग्ज़िट” न देने से जुड़ा था।

मामले की पृष्ठभूमि

नागराज वी. मायलैंडला बनाम पीआई अपॉर्चुनिटीज फंड-I एवं अन्य मामले में निवेशकों ने एक डिजिटल पेमेंट कंपनी में बड़ा निवेश किया था। इस निवेश के साथ एक समझौता (SASHA) हुआ था, जिसमें यह तय था कि एक निश्चित समय तक निवेशकों को एग्ज़िट दिया जाएगा।

लेकिन कंपनी और उसके प्रमोटर्स इस शर्त को पूरा नहीं कर सके। इसके बाद विवाद सिंगापुर इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर (SIAC) में पहुंचा, जहां तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल ने 5 जुलाई 2024 को अपना फैसला सुनाया।

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आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने पाया कि प्रमोटर्स ने निवेशकों को एग्ज़िट देने की अपनी जिम्मेदारी निभाई नहीं।

ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा कि:

• निवेशकों को “एग्ज़िट प्राइस” के आधार पर हर्जाना दिया जाए

• अगर 90 दिनों में भुगतान नहीं होता है, तो निवेशक “स्ट्रैटेजिक सेल” लागू कर सकते हैं

• इस राशि पर ब्याज भी देय होगा

ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट कहा,

“निवेशकों को एग्ज़िट देना एक अनिवार्य दायित्व था, जिसे पूरा नहीं किया गया।”

प्रमोटर्स ने इस अवॉर्ड को सिंगापुर हाई कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि उन्हें उचित सुनवाई नहीं मिली और कुछ कानूनी पहलुओं पर ट्रिब्यूनल ने विचार नहीं किया।

लेकिन सिंगापुर हाई कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और कहा कि ट्रिब्यूनल ने सभी मुद्दों पर विचार किया है। अदालत ने अवॉर्ड को सही ठहराया।

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इसके बाद निवेशकों ने भारत में इस अवॉर्ड को लागू करने के लिए मद्रास हाई कोर्ट का रुख किया।

हाई कोर्ट ने कहा कि विदेशी आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को लागू करते समय अदालत को बहुत सीमित दायरे में ही जांच करनी चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा,

“कोर्ट अवॉर्ड की मेरिट्स की दोबारा समीक्षा नहीं कर सकता।”

अदालत ने प्रमोटर्स की सभी आपत्तियों को खारिज करते हुए अवॉर्ड को डिक्री मान लिया और इसे लागू करने की अनुमति दे दी।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद कहा कि विदेशी आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को चुनौती देने के लिए “पब्लिक पॉलिसी” का आधार बहुत सीमित है।

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

• हर कानूनी गलती “पब्लिक पॉलिसी” का उल्लंघन नहीं होती

• केवल वही मामले रोके जा सकते हैं, जहां मूलभूत कानूनी सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन हो

कोर्ट ने यह भी माना कि शेयरों का “सरेन्डर” और “बाय-बैक” अलग-अलग अवधारणाएं हैं और इस मामले में कानून का उल्लंघन नहीं हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए विदेशी आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को लागू करने योग्य माना।

इसके साथ ही प्रमोटर्स द्वारा उठाए गए सभी कानूनी आपत्तियों को खारिज कर दिया गया और निवेशकों को राहत दी गई।

Case Title: Nagaraj V. Mylandla vs PI Opportunities Fund-I & Ors.

Judges: Justice Sanjay Kumar and Justice K. Vinod Chandran

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