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गलत तरीके से रोकी गई पदोन्नति पर हाईकोर्ट का फैसला: कर्मचारी को मिलेंगे सभी वित्तीय लाभ

Shivam
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चंदर भान बनाम हरियाणा राज्य और अन्य - पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि जिन कर्मचारियों को पूर्वव्यापी पदोन्नति दी गई है, उन्हें "काम नहीं तो वेतन नहीं" नियम के कारण वेतन बकाया से वंचित नहीं किया जा सकता है।

गलत तरीके से रोकी गई पदोन्नति पर हाईकोर्ट का फैसला: कर्मचारी को मिलेंगे सभी वित्तीय लाभ

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी कर्मचारी को विभागीय गलती के कारण समय पर पदोन्नति नहीं मिलती, तो बाद में दी गई रेट्रोस्पेक्टिव (पिछली तारीख से) पदोन्नति के साथ उसे वेतन और अन्य वित्तीय लाभ भी मिलेंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में “नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता।

यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप मौदगिल की एकल पीठ ने चंदर भान बनाम हरियाणा राज्य मामले में 20 फरवरी 2026 को सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता चंदर भान ने 24 अप्रैल 1987 को नारवाना (जिला जींद) में पी.आर. चौकीदार के रूप में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के तौर पर काम शुरू किया था। बाद में 1 अप्रैल 1993 को उनकी सेवाएं नियमित कर दी गईं।

इसके बाद उन्हें 2011 में क्लर्क और 2014 में सब-इंस्पेक्टर के पद पर पदोन्नत किया गया। लेकिन उनकी शिकायत थी कि उनसे जूनियर कर्मचारी जैसे सतबीर सिंह को उनसे पहले सब-इंस्पेक्टर और बाद में इंस्पेक्टर बना दिया गया।

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इस पर उन्होंने 2017 में विभाग को प्रतिनिधित्व देकर मांग की कि उन्हें भी उसी तारीख से पदोन्नति और उससे जुड़े लाभ दिए जाएं जिस दिन उनके जूनियर को पदोन्नति मिली थी।

विभाग ने बाद में उनकी मांग स्वीकार करते हुए उन्हें डीम्ड (काल्पनिक/पिछली तारीख से) पदोन्नति तो दे दी, लेकिन उस अवधि के वेतन के बकाये देने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि उन्होंने उस समय उस पद पर काम नहीं किया था।

याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में कहा कि जब विभाग खुद मान चुका है कि कर्मचारी को समय पर पदोन्नति मिलनी चाहिए थी, तो वेतन और अन्य वित्तीय लाभ से वंचित रखना मनमाना और भेदभावपूर्ण है।

उन्होंने तर्क दिया कि कर्मचारी हमेशा उच्च पद पर काम करने के लिए तैयार था, लेकिन विभागीय गलती के कारण उसे अवसर नहीं मिला। इसलिए “नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत यहां लागू नहीं हो सकता।

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राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता को केवल वरिष्ठता और पदोन्नति की स्थिति ठीक करने के लिए पिछली तारीख से पदोन्नति दी गई है।

सरकार के अनुसार, चूंकि कर्मचारी ने उस अवधि में वास्तव में उच्च पद पर काम नहीं किया, इसलिए उसे उस समय का वेतन नहीं दिया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि विभाग द्वारा दी गई डीम्ड पदोन्नति स्वयं इस बात का प्रमाण है कि कर्मचारी को पहले गलत तरीके से पदोन्नति से वंचित किया गया था।

अदालत ने कहा,

“यदि कर्मचारी को प्रशासनिक गलती के कारण पदोन्नति से वंचित रखा गया है, तो उसे वित्तीय लाभ से भी वंचित नहीं किया जा सकता।”

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न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत हर मामले में लागू नहीं होता, खासकर तब जब कर्मचारी काम करने के लिए तैयार था लेकिन विभागीय त्रुटि के कारण उसे अवसर नहीं मिला।

अदालत ने 4 सितंबर 2020 और 12 नवंबर 2020 के उन आदेशों की शर्तों को रद्द कर दिया, जिनमें याचिकाकर्ता को बकाया वेतन देने से मना किया गया था।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि चंदर भान को उनकी डीम्ड पदोन्नति के आधार पर क्लर्क (9 सितंबर 2008), सब-इंस्पेक्टर (20 अप्रैल 2012) और इंस्पेक्टर (17 जून 2016) के पदों से जुड़े सभी वित्तीय लाभ, बकाया वेतन और वेतन पुनर्निर्धारण प्रदान किया जाए।

साथ ही अदालत ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के तीन महीने के भीतर पूरी की जाए।

Case Title: Chander Bhan vs State of Haryana and Another

Case Number: CWP-2946-2019

Decision Date: 20 February 2026

Petitioner’s Counsel: Mr. Vivek Singla, Advocate

Respondent’s Counsel: Dr. Malvika Singh, Deputy Advocate General (DAG), Haryana

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