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गर्भावस्था शिक्षा में बाधा नहीं बननी चाहिए: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने BUMS की छात्रा को राहत दी, अगले सेमेस्टर के लिए रास्ता साफ किया

Shivam
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रुमैसा अरवा बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य - मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने BUMS की छात्रा को मातृत्व राहत प्रदान की, कॉलेज को परिणाम घोषित करने और उपस्थिति की कमी के बावजूद प्रवेश की अनुमति देने का आदेश दिया।

गर्भावस्था शिक्षा में बाधा नहीं बननी चाहिए: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने BUMS की छात्रा को राहत दी, अगले सेमेस्टर के लिए रास्ता साफ किया

जबलपुर में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि पढ़ाई के दौरान शादी या गर्भावस्था किसी छात्रा की शिक्षा का रास्ता नहीं रोक सकती। कोर्ट ने BUMS की छात्रा रुमैसा अरवा की याचिका स्वीकार करते हुए उसकी द्वितीय सेमेस्टर की परीक्षा का परिणाम घोषित करने और जरूरी शर्तें पूरी होने पर आगे की पढ़ाई जारी रखने की अनुमति देने का निर्देश दिया। यह आदेश 2 फरवरी 2026 को न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

रुमैसा अरवा ने 2022 में भोपाल के हकीम सैयद जियाउल हसन, सरकारी स्वायत्त यूनानी कॉलेज में BUMS कोर्स में दाखिला लिया था। उन्होंने पहला वर्ष सफलतापूर्वक पास किया। दूसरे वर्ष के दौरान उनकी शादी हुई और वह गर्भवती हो गईं। 20 नवंबर 2024 को उन्होंने बच्चे को जन्म दिया।

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इसके बाद उन्होंने मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया, लेकिन कॉलेज ने केवल 10 प्रतिशत की छूट दी। उपस्थिति 75 प्रतिशत से कम रहने के कारण उन्हें परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी गई। इस फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 14 अक्टूबर 2021 को सभी शिक्षण संस्थानों को महिला छात्रों के लिए मातृत्व और चाइल्ड केयर लीव की नीति बनाने के निर्देश दिए थे, लेकिन यहां अब तक ऐसी कोई नीति नहीं बनी। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कामकाजी महिलाओं के मातृत्व अवकाश के अधिकार को मान्यता दी गई थी।

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वहीं, राज्य की ओर से कहा गया कि नियमों के अनुसार 75 प्रतिशत उपस्थिति जरूरी है और छात्रा की उपस्थिति करीब 56.64 प्रतिशत ही थी। इसलिए केवल 10 प्रतिशत की छूट दी गई थी।

अदालत की टिप्पणी

खंडपीठ ने साफ शब्दों में कहा कि कामकाजी महिलाओं के लिए जो सिद्धांत लागू होते हैं, उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही महिलाओं पर लागू न करने का कोई कारण नहीं है। अदालत ने कहा, “पढ़ाई के दौरान शादी या गर्भावस्था किसी महिला की शिक्षा पूरी करने में बाधा नहीं बननी चाहिए।”

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कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि जरूरत पड़ने पर कॉलेजों को पढ़ाई की सामग्री और अतिरिक्त कक्षाएं उपलब्ध करानी चाहिए, ताकि छात्राएं अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें। साथ ही, जहां संभव हो, चाइल्ड केयर लीव का लाभ भी दिया जाना चाहिए।

फैसला

अदालत ने इस मामले को “विशेष परिस्थिति” मानते हुए छात्रा को उपस्थिति के नियम में 75 प्रतिशत तक की छूट देने का आदेश दिया। इसके साथ ही निर्देश दिया गया कि उसकी द्वितीय सेमेस्टर की परीक्षा का परिणाम घोषित किया जाए और यदि वह पास हो जाती है तो उसे तृतीय सेमेस्टर में दाखिला लेने की अनुमति दी जाए।

कोर्ट ने याचिका मंजूर करते हुए किसी भी तरह की लागत नहीं लगाई।

Case Title:- Rumaisa Arwa vs State of Madhya Pradesh & Others

Case Number:- Writ Petition No. 5457 of 2025

Date of Decision:- 2 February 2026

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