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गरीबी सज़ा की शर्त नहीं बन सकती: राजस्थान हाईकोर्ट ने जुर्माना जमा शर्त हटाकर NDPS दोषी की रिहाई का आदेश

Shivam
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राजेश कुशवाह बनाम राजस्थान राज्य - राजस्थान उच्च न्यायालय ने एनडीपीएस के दोषी की तत्काल रिहाई का आदेश दिया, कहा कि जुर्माना अदा करने में असमर्थता अनुच्छेद 21 के अधिकारों को रद्द नहीं कर सकती।

गरीबी सज़ा की शर्त नहीं बन सकती: राजस्थान हाईकोर्ट ने जुर्माना जमा शर्त हटाकर NDPS दोषी की रिहाई का आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम आदेश में साफ कहा कि गरीबी किसी व्यक्ति की आज़ादी में बाधा नहीं बन सकती। कोर्ट ने NDPS मामले में दोषी ठहराए गए एक कैदी को केवल इसलिए जेल में रोके रखने को असंवैधानिक माना, क्योंकि वह जुर्माने की राशि जमा नहीं कर सका था। अदालत ने इसे अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला राजेश कुशवाह से जुड़ा है, जिन्हें NDPS एक्ट की धारा 8/15 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल की सज़ा दी गई थी। वह लगभग 7 साल 11 महीने की सज़ा काट चुके थे।

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अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट ने उनकी सज़ा को अपील लंबित रहने तक निलंबित कर दिया था, लेकिन इसके साथ ₹1 लाख जुर्माना जमा करने की शर्त लगाई गई थी। आवेदक का कहना था कि अत्यंत गरीबी के कारण वह यह राशि जमा नहीं कर सके, जिसके चलते रिहाई आदेश के बावजूद वह जेल में ही बंद रहे।

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कोर्ट की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति अनूप कुमार धंध ने सुनवाई के दौरान वकीलों की हड़ताल के बावजूद मामले को सुना, यह कहते हुए कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अदालत का काम नहीं रुक सकता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले CBI बनाम अशोक सिरपाल का हवाला देते हुए कहा कि सज़ा निलंबन की शर्तें ऐसी नहीं होनी चाहिएं, जिन्हें पूरा करना किसी आरोपी के लिए असंभव हो।

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अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा,

“यदि जुर्माना जमा करने की शर्त के कारण कोई व्यक्ति जेल में ही बंद रह जाता है, तो यह उसकी अपील के अधिकार और जीवन की स्वतंत्रता को निष्फल कर देता है।”

वकीलों की हड़ताल पर कड़ा रुख

कोर्ट ने इस आदेश में वकीलों की हड़ताल पर भी कड़ी टिप्पणी की। न्यायालय ने दो टूक कहा कि कोर्ट बहिष्कार से सीधे तौर पर मुकदमेबाजों के त्वरित न्याय के अधिकार का हनन होता है।

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अदालत ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि वकीलों को हड़ताल का अधिकार नहीं है, खासकर जब मामला किसी व्यक्ति की आज़ादी से जुड़ा हो।

कोर्ट का फैसला

सभी तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने ₹1 लाख जुर्माना जमा करने की शर्त को वापस ले लिया और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि आवेदक को तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते अन्य शर्तों का पालन किया जाए।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल इस मामले की विशेष परिस्थितियों तक सीमित रहेगा और इसे भविष्य के मामलों में मिसाल नहीं माना जाएगा। साथ ही आदेश की प्रति बार काउंसिल ऑफ इंडिया और राजस्थान बार काउंसिल को भेजने के निर्देश दिए गए।

Case Title: Rajesh Kushwah v. State of Rajasthan

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