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गोवा हाईकोर्ट ने POCSO मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी, नाबालिग से संबंध में सहमति को माना अप्रासंगिक

Vivek G.
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शोभित कुमार बनाम राज्य, गोवा हाईकोर्ट ने POCSO मामले में नाबालिग से संबंध में सहमति को अप्रासंगिक मानते हुए दोषसिद्धि बरकरार रखी।

गोवा हाईकोर्ट ने POCSO मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी, नाबालिग से संबंध में सहमति को माना अप्रासंगिक

बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में नाबालिग लड़की से जुड़े अपहरण और दुष्कर्म के मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने साफ कहा कि जब पीड़िता 18 वर्ष से कम हो, तो उसकी सहमति कानूनी रूप से मायने नहीं रखती।

यह फैसला न्यायमूर्ति शिरीराम वी. शिरसट की एकल पीठ ने Criminal Appeal No. 318 of 2023 में सुनाया। आरोपी शोभित कुमार ने फास्ट ट्रैक POCSO कोर्ट, पणजी के 16 जनवरी 2023 के आदेश को चुनौती दी थी।

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मामले की पृष्ठभूमि

रिकॉर्ड के अनुसार, शिकायतकर्ता ने 11 दिसंबर 2021 को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उसकी 16 वर्ष 9 माह की बेटी अचानक लापता हो गई है। वह कक्षा 10 की छात्रा थी और अपनी मां के साथ निर्माण स्थल पर रह रही थी।

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मां ने बताया कि बेटी पास की दुकान पर सामान लेने गई थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। बाद में पता चला कि वह आरोपी के साथ गोवा से बाहर चली गई थी।

जांच में सामने आया कि दोनों पहले से एक-दूसरे को जानते थे। आरोपी निर्माण स्थल पर सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करता था। पीड़िता ने अदालत में कहा कि आरोपी ने उसे बस स्टैंड पर मिलने के लिए कहा और धमकी दी कि अगर वह नहीं आई तो वह आत्महत्या कर लेगा। डर के कारण वह उसके साथ चली गई।

दोनों अहमदाबाद तक गए और वहां किराए के कमरे में साथ रहे। पीड़िता ने गवाही में बताया कि आरोपी ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।

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ट्रायल कोर्ट का फैसला

फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (POCSO), पणजी ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 363 (अपहरण), 376 (बलात्कार) और POCSO Act की धारा 4 के तहत दोषी ठहराया।

उसे 10 वर्ष कठोर कारावास सहित अलग-अलग सजाएं सुनाई गईं।

अपील में आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि मामला प्रेम संबंध का था और पीड़िता 16 वर्ष से अधिक उम्र की थी, इसलिए संबंध सहमति से थे। यह भी कहा गया कि जांच में खामियां थीं, व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम चैट्स को जब्त नहीं किया गया, और मेडिकल रिपोर्ट में चोट का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

उन्होंने कई न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल पीड़िता की गवाही पर दोषसिद्धि नहीं की जानी चाहिए।

अदालत की टिप्पणी

न्यायालय ने विस्तृत रूप से साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन किया। अदालत ने पाया कि पीड़िता की गवाही सुसंगत और भरोसेमंद है।

फैसले में कहा गया कि पीड़िता ने धारा 164 CrPC के तहत दिए बयान और अदालत में दी गई गवाही में एक समान तथ्य बताए हैं।

मेडिकल अधिकारी (PW-8) ने अपनी रिपोर्ट में “vaginal penetration” के संकेत और पुराने हाइमनल टियर (झिल्ली के फटने) की पुष्टि की थी। अदालत ने इसे महत्वपूर्ण माना।

न्यायालय ने कहा, “पीड़िता की गवाही विश्वसनीय है और उसे जिरह में कमजोर नहीं किया जा सका।”

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सहमति के मुद्दे पर अदालत ने स्पष्ट किया कि जब पीड़िता 18 वर्ष से कम हो, तो उसकी सहमति कानूनी रूप से मान्य नहीं होती।

अदालत ने यह भी कहा कि जांच में यदि कुछ त्रुटियां हों भी, तो मात्र उसी आधार पर आरोपी को बरी नहीं किया जा सकता, जब तक कि उससे गंभीर पूर्वाग्रह साबित न हो।

अंतिम निर्णय

सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।

आरोपी की अपील खारिज कर दी गई और उसकी दोषसिद्धि तथा सजा को बरकरार रखा गया।

Case Title: Shobhit Kumar vs State

Case No.: Criminal Appeal No. 318 of 2023

Decision Date: 16 February 2026

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