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गुजरात हाईकोर्ट ने पिता की हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज की, ननिहाल में बच्ची को बताया सुरक्षित

Vivek G.
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अकुलकुमार दिनेशभाई राणा और अन्य बनाम गुजरात राज्य और अन्य। गुजरात हाईकोर्ट ने पिता की हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज की। कोर्ट ने कहा, ननिहाल में बच्ची की कस्टडी अवैध हिरासत नहीं।

गुजरात हाईकोर्ट ने पिता की हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज की, ननिहाल में बच्ची को बताया सुरक्षित

अहमदाबाद में गुजरात हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक पांच साल की बच्ची की कस्टडी को लेकर दाखिल हैबियस कॉर्पस याचिका पर अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर मां अपनी छोटी बेटी को देखभाल के लिए ननिहाल भेजती है, तो उसे “गैरकानूनी हिरासत” नहीं कहा जा सकता।

यह मामला Gujarat High Court के समक्ष विशेष आपराधिक आवेदन के रूप में आया था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता पिता ने आरोप लगाया कि उनकी पत्नी अगस्त 2023 में चार साल की बेटी को मेहसाणा स्थित अपने मायके ले गई और तब से बच्ची को “गैरकानूनी रूप से” अपने माता-पिता के पास रखा है।

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रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों की शादी 2018 में हुई थी। पिता केंद्र सरकार में कर्मचारी हैं, जबकि मां राज्य सरकार में कार्यरत हैं। 2019 में बेटी का जन्म हुआ।

2021 तक दोनों भचाऊ में साथ रह रहे थे, लेकिन उसके बाद वैवाहिक विवाद शुरू हो गया। पिता का कहना था कि उन्होंने बच्ची का प्ले-ग्रुप में दाखिला कराया था और फीस भी जमा की थी, फिर भी मां ने विरोध के बावजूद बच्ची को मेहसाणा ले जाकर अपने माता-पिता के पास रख दिया।

कोर्ट के समक्ष दायर याचिका में इसे “अवैध निरुद्ध” बताया गया।

अदालत में क्या हुआ?

सुनवाई के दौरान जस्टिस एन.एस. संजय गौड़ा और जस्टिस डी.एम. व्यास की पीठ ने दोनों पक्षों को विस्तार से सुना।

पीठ ने सबसे पहले यह सवाल उठाया कि क्या मां द्वारा चार साल की बच्ची को अपने माता-पिता की देखरेख में रखना कानूनन अवैध माना जा सकता है?

कोर्ट ने स्पष्ट कहा, “चार साल की बच्ची का अपनी मां के साथ रहना किसी भी स्थिति में अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब कस्टडी को लेकर कोई पारिवारिक अदालत का आदेश मौजूद नहीं है।”

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बेंच ने यह भी कहा कि कामकाजी दंपति के लिए छोटे बच्चे की देखभाल आसान नहीं होती। ऐसे में अगर मां अपने माता-पिता की मदद लेती है, तो इसे गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता।

पीठ ने टिप्पणी की, “अगर एक कामकाजी महिला अपने बच्चे की सुरक्षित परवरिश के लिए अपने माता-पिता की सहायता लेती है, तो पति यह नहीं कह सकता कि यह अवैध हिरासत है।”

पिता की दलीलें

पिता की ओर से दलील दी गई कि अदालत का मुख्य दायित्व बच्चे के हित को सर्वोपरि रखना है। यह भी कहा गया कि बच्ची की बेहतर परवरिश पिता के पास हो सकती है, क्योंकि उनके माता-पिता भी देखभाल के लिए उपलब्ध हैं।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बच्ची को उनकी इच्छा के विरुद्ध मायके ले जाया गया।

मां का पक्ष

मां की ओर से कहा गया कि दोनों सरकारी कर्मचारी हैं और नौकरी के कारण बच्ची की परवरिश में व्यावहारिक कठिनाइयाँ थीं। इसलिए माता-पिता की मदद लेना जरूरी था।

यह भी बताया गया कि बच्ची की देखभाल मां ही कर रही हैं, ननिहाल केवल सहयोग कर रहा है।

अदालत ने पाया कि दोनों के बीच गंभीर वैवाहिक विवाद है और मामला अब बच्ची की कस्टडी की लड़ाई में बदल चुका है।

पीठ ने कहा, “यह याचिका मूल रूप से कस्टडी प्राप्त करने का प्रयास है, जिसे हैबियस कॉर्पस के जरिए हासिल नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि अब तक किसी भी पक्ष ने फैमिली कोर्ट में विधिवत कस्टडी याचिका दायर नहीं की है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पहले ही पिता को मुलाकात (विजिटेशन) का अधिकार दिया था। हर सप्ताहांत मेहसाणा सर्किट हाउस में मुलाकात की व्यवस्था की गई थी, जिसे बाद में पूरे वीकेंड तक बढ़ाया गया। दोनों पक्षों ने माना कि मुलाकातें शांतिपूर्ण ढंग से हो रही हैं।

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अंतिम निर्णय

डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि बच्ची को ननिहाल में रखना “गैरकानूनी निरुद्ध” नहीं है।

अदालत ने पिता की हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज कर दी और कहा कि यदि कस्टडी को लेकर विवाद है, तो संबंधित पक्ष फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जब तक फैमिली कोर्ट कोई आदेश न दे, तब तक पूर्व में तय विजिटेशन व्यवस्था जारी रहेगी।

इसके साथ ही याचिका खारिज कर दी गई और लंबित आवेदन रिकॉर्ड में समाहित कर दिए गए।

Case Title: Akulkumar Dineshbhai Rana & Anr. v. State of Gujarat & Ors.

Case No.: R/Special Criminal Application (Habeas Corpus) No. 11700 of 2025

Decision Date: 06 February 2026

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