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नाबालिग का कल्याण सर्वोपरि; हैबियस कॉर्पस में नहीं तय होगी बच्चों की कस्टडी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय जाने को कहा

Shivam
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि नाबालिग बच्चों की कस्टडी का फैसला हैबियस कॉर्पस में नहीं किया जा सकता, इसके लिए परिवार न्यायालय ही उचित मंच है। - रिजवाना और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य

नाबालिग का कल्याण सर्वोपरि; हैबियस कॉर्पस में नहीं तय होगी बच्चों की कस्टडी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय जाने को कहा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया कि नाबालिग बच्चों की कस्टडी (custody) जैसे जटिल मामलों का फैसला हैबियस कॉर्पस याचिका में नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में विस्तृत जांच और साक्ष्यों की आवश्यकता होती है, जो केवल परिवार न्यायालय (Family Court) ही कर सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला रिजवाना और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य से जुड़ा है। याचिकाकर्ता (माता) ने अदालत से मांग की थी कि उसके दो नाबालिग बच्चों को अदालत के सामने प्रस्तुत कर उनकी कस्टडी उसे सौंपी जाए।

याचिका में आरोप लगाया गया कि विवाह के बाद पति द्वारा दहेज की मांग पूरी न होने पर महिला को घर से निकाल दिया गया और बच्चों को उससे अलग कर दिया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत छोटे बच्चों की कस्टडी मां को मिलनी चाहिए।

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न्यायमूर्ति अनिल कुमार की पीठ ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं पर विचार किया।

अदालत ने कहा कि:

“नाबालिग की कस्टडी तय करते समय सबसे महत्वपूर्ण तत्व उसका कल्याण (welfare) होता है, जो किसी भी व्यक्तिगत कानून से ऊपर है।”

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि Guardians and Wards Act, 1890 एक सामान्य कानून है, जो सभी धर्मों के लोगों पर लागू होता है।

“सिर्फ इस आधार पर कि पक्षकार मुस्लिम पर्सनल लॉ से शासित हैं, उन्हें इस अधिनियम के तहत राहत लेने से रोका नहीं जा सकता,” अदालत ने कहा।

अदालत ने यह भी जोड़ा कि कस्टडी विवादों में साक्ष्य, परिस्थितियों और दोनों पक्षों की स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन आवश्यक होता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि:

• कस्टडी और अभिभावकता (guardianship) से जुड़े मामलों में परिवार न्यायालय को व्यापक अधिकार दिए गए हैं।

• पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 के तहत ऐसे मामलों की सुनवाई विशेष रूप से परिवार न्यायालय द्वारा की जानी चाहिए।

• हैबियस कॉर्पस कार्यवाही केवल त्वरित (summary) राहत के लिए होती है, न कि विस्तृत तथ्यात्मक जांच के लिए।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि:

“हैबियस कॉर्पस याचिका में बच्चों की कस्टडी का विस्तृत निर्णय देना संभव नहीं है।”

इसके साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह उचित राहत के लिए सक्षम परिवार न्यायालय का रुख करे, जहां सभी पहलुओं की विस्तार से जांच की जा सके।

अंततः, याचिका का निस्तारण कर दिया गया।

Case Details

Case Title: Rizwana and 2 Others vs State of U.P. and 3 Others

Case Number: Habeas Corpus Writ Petition No. 835 of 2025

Judge: Justice Anil Kumar

Decision Date: March 25, 2026

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