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हेलिकॉप्टर रिपोर्ट पर दर्ज FIR पर ब्रेक: पत्रकारों को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से अंतरिम राहत

Shivam
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मानिक गोयल और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य - पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने मुख्यमंत्री की यात्रा से जुड़ी हेलीकॉप्टर रिपोर्ट को लेकर पत्रकारों और आरटीआई कार्यकर्ता के खिलाफ एफआईआर की जांच पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देते हुए रोक लगा दी है।

हेलिकॉप्टर रिपोर्ट पर दर्ज FIR पर ब्रेक: पत्रकारों को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से अंतरिम राहत

पत्रकारिता की सीमाओं और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर एक अहम टिप्पणी करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक संवेदनशील मामले में हस्तक्षेप किया है। कोर्ट ने एक पत्रकार और अन्य याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दर्ज FIR की जांच पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह FIR पंजाब के मुख्यमंत्री से जुड़े हेलिकॉप्टर उड़ानों पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के बाद दर्ज की गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला Manik Goyal & Others बनाम State of Punjab से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं में एक कानून छात्र और RTI कार्यकर्ता, दो पत्रकार और एक मीडिया संस्थान के संपादक शामिल हैं।

रिकॉर्ड के अनुसार, याचिकाकर्ता नंबर-1 ने RTI के तहत पंजाब सरकार द्वारा मार्च 2022 से अब तक हेलिकॉप्टर, जेट और विमान किराये पर लेने से जुड़े खर्च की जानकारी मांगी थी। सरकार ने यह कहते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया कि यह सुरक्षा से जुड़ा विषय है।

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इसके बाद, सार्वजनिक वेबसाइट FlightRadar24 पर उपलब्ध उड़ान डेटा के आधार पर एक समाचार रिपोर्ट प्रकाशित की गई, जिसमें दिसंबर 2025 के दौरान हेलिकॉप्टर की कई उड़ानों का ज़िक्र था उस समय मुख्यमंत्री विदेश यात्रा पर थे। इसी रिपोर्ट के बाद साइबर क्राइम थाना, लुधियाना में FIR दर्ज की गई।

FIR में क्या आरोप लगाए गए

FIR में आरोप लगाया गया कि रिपोर्ट में उड़ान डेटा की गलत व्याख्या की गई, जिससे भ्रामक और अप्रमाणित जानकारी फैलाई गई। राज्य का कहना था कि यह सामग्री जनता को गुमराह कर सकती है, सरकारी कामकाज पर असर डाल सकती है और सार्वजनिक शांति भंग करने की क्षमता रखती है।

इसी आधार पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराएं 353(1), 353(2) और 61(2) लगाई गईं।

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याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि प्रकाशित रिपोर्ट पूरी तरह सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी पर आधारित थी।

उन्होंने दलील दी कि संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और सरकार के कामकाज पर सवाल उठाना या आलोचना करना अपराध नहीं हो सकता।

वकील ने सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों केदार नाथ सिंह, रोमेश थापर और बेनेट कोलमैन मामलों का हवाला देते हुए कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है। “सिर्फ इसलिए कि किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति को आलोचना पसंद नहीं आई, आपराधिक कानून का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता,” यह तर्क रखा गया।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कहा कि प्रकाशित सामग्री में भड़काऊ तत्व थे और इसका असर सार्वजनिक शांति पर पड़ सकता था।

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सरकार ने कोर्ट से समय मांगा ताकि वह जांच से जुड़ी अतिरिक्त सामग्री रिकॉर्ड पर रख सके और यह दिखा सके कि FIR दर्ज करना क्यों ज़रूरी था।

कोर्ट की अहम टिप्पणियां

जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि आलोचना और व्यंग्य को अक्सर सत्ता में बैठे लोग सहजता से नहीं लेते।

कोर्ट ने कहा,

“केवल इस आधार पर कि किसी सार्वजनिक पदाधिकारी को कोई सामग्री आपत्तिजनक लगती है, राज्य की कार्रवाई तय नहीं की जा सकती।”

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अदालत ने यह भी जोड़ा कि कानून का पैमाना हमेशा “साधारण समझ वाले व्यक्ति” का होना चाहिए, न कि संभावित या दूर की प्रतिक्रिया का।

अदालत का निर्णय

सभी दलीलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर आपराधिक प्रक्रिया जारी रहने से याचिकाकर्ताओं के अधिकारों को गंभीर नुकसान हो सकता है।

अदालत ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक FIR से जुड़ी आगे की जांच पर रोक रहेगी। मामले को 23 फरवरी 2026 के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

Case Title: Manik Goyal & Others v. State of Punjab & Another

Case Number: CRM-M-391-2026

Date of Order: January 12, 2026

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