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कलकत्ता हाईकोर्ट का अहम आदेश: 498A मामले में सास-ननद को धारा 308 से राहत, बाकी आरोपियों पर ट्रायल जारी

Vivek G.
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भरत सोनी एवं अन्य बनाम नंदिनी सोनी एवं अन्य, कलकत्ता हाईकोर्ट ने 498A और 308 IPC मामले में सास-ननद को राहत दी, पति समेत अन्य आरोपियों पर ट्रायल जारी रहेगा।

कलकत्ता हाईकोर्ट का अहम आदेश: 498A मामले में सास-ननद को धारा 308 से राहत, बाकी आरोपियों पर ट्रायल जारी

कलकत्ता हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने सास और ननद को भारतीय दंड संहिता की धारा 308 (गंभीर चोट पहुँचाने का प्रयास) के आरोप से राहत देते हुए उन्हें इस धारा से डिस्चार्ज कर दिया, जबकि पति समेत अन्य आरोपियों को ट्रायल का सामना करने का निर्देश दिया।

यह आदेश न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी दास ने पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिका CRR 4013 of 2023 में दायर की गई थी। रिकॉर्ड के अनुसार (पृष्ठ 1, ), यह मामला पति और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका से संबंधित है।

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शिकायतकर्ता पत्नी ने आरोप लगाया था कि विवाह के बाद उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। आरोप था कि जून 2015 में सास और ननद ने उसे गलत दवा दी, जिससे उसे उल्टी, रक्तस्राव और दौरे पड़े।

इसके अलावा मार्च 2016 की एक घटना का जिक्र किया गया, जिसमें पति और अन्य ससुराल वालों पर पेट में लात मारकर गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुँचाने का आरोप लगाया गया। बाद में पुलिस ने धारा 498A, 406, 325 और 308 सहित विभिन्न धाराओं में चार्जशीट दाखिल की।

ट्रायल कोर्ट ने धारा 308 से डिस्चार्ज की मांग खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।

याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि शिकायत तलाक के मुकदमे के समन मिलने के बाद दर्ज कराई गई, जो बदले की भावना से प्रेरित है।

उनके वकील ने कहा, “अधिकांश आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं। सास और ननद के खिलाफ कोई ठोस और विशिष्ट भूमिका सामने नहीं आती।”

यह भी तर्क दिया गया कि डॉक्टर का प्रमाणपत्र घटना के काफी समय बाद जारी हुआ और उसमें कथित ‘गलत दवा’ का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

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पत्नी की ओर से कहा गया कि उसे लगातार प्रताड़ित किया गया और मेडिकल दस्तावेजाें से उसकी स्थिति साबित होती है।

राज्य की ओर से भी कहा गया कि जांच के दौरान पर्याप्त सामग्री सामने आई है। अभियोजन ने अदालत से कहा, “इस चरण पर साक्ष्यों का गहराई से मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। आरोपियों को ट्रायल का सामना करना चाहिए।”

अदालत का विश्लेषण

न्यायालय ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध मेडिकल कागजात और शिकायत की सामग्री का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया।

अदालत ने पाया कि 6 जुलाई 2015 की मूल चिकित्सकीय पर्ची में ‘गलत दवा’ दिए जाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। जबकि दो वर्ष बाद जारी प्रमाणपत्र में विस्तृत विवरण दर्ज किया गया।

पीठ ने कहा, “केवल नाम लेने से आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं होती। अदालत को देखना होगा कि क्या प्रथम दृष्टया ठोस सामग्री मौजूद है।”

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि 18 मार्च 2016 की कथित मारपीट की घटना के संबंध में पति के खिलाफ विशिष्ट आरोप और उसी तारीख का चिकित्सकीय दस्तावेज मौजूद है।

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अदालत का फैसला

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि सास और ननद के खिलाफ धारा 308 के तहत पर्याप्त प्रथम दृष्टया सामग्री नहीं है।

आदेश में कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने डिस्चार्ज अर्जी खारिज करते समय पर्याप्त कारण दर्ज नहीं किए।

अदालत ने आदेश दिया कि सास और ननद को धारा 308 से डिस्चार्ज किया जाए। हालांकि, पति और अन्य आरोपियों के खिलाफ 18 मार्च 2016 की घटना के संबंध में आरोप प्रथम दृष्टया स्थापित होते हैं, इसलिए उन्हें ट्रायल का सामना करना होगा।

याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की गई।

Case Title: Bharat Soni & Ors. vs Nandini Soni & Anr.

Case No.: CRR 4013 of 2023

Decision Date: 24 February 2026

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