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शादी के झूठे वादे पर रेप केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, सहमति से बने संबंध को अपराध नहीं माना

Vivek G.
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प्रमोद कुमार नवरत्न बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य,सुप्रीम कोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर रेप केस में बड़ा फैसला देते हुए सहमति से बने संबंध को अपराध नहीं माना और एफआईआर रद्द की।

शादी के झूठे वादे पर रेप केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, सहमति से बने संबंध को अपराध नहीं माना

सुप्रीम कोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर बनाए गए कथित शारीरिक संबंधों को लेकर दर्ज रेप केस में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि अगर दोनों पक्ष बालिग हैं और संबंध सहमति से बने हैं, तो केवल रिश्ता टूट जाने के आधार पर उसे आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता।

यह फैसला छत्तीसगढ़ से जुड़े एक मामले में आया, जिसमें एक महिला वकील ने अपने सहकर्मी वकील पर शादी का झूठा वादा कर कई बार दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की पूरी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद एफआईआर और चार्जशीट दोनों को रद्द कर दिया।

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मामले की पृष्ठभूमि

रिकॉर्ड के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला पेशे से अधिवक्ता है और उसकी शादी वर्ष 2011 में हुई थी। दोनों के बीच मतभेद होने के बाद तलाक का मामला चल रहा था। इसी दौरान वर्ष 2022 में एक सामाजिक कार्यक्रम में उसकी मुलाकात आरोपी अधिवक्ता से हुई और दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं।

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महिला ने आरोप लगाया कि आरोपी उसे अपने दोस्त के घर ले गया और शादी का वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद भी आरोपी ने कई बार शादी का आश्वासन देकर संबंध बनाए रखे। महिला ने यह भी कहा कि वह आरोपी के बच्चे से गर्भवती हो गई थी और आरोपी ने उसे गर्भपात के लिए मजबूर किया।

इन आरोपों के आधार पर फरवरी 2025 में पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(n) के तहत एफआईआर दर्ज की। हाईकोर्ट ने इस एफआईआर को रद्द करने की आरोपी की याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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आरोपी और राज्य का पक्ष

आरोपी की ओर से दलील दी गई कि शिकायतकर्ता एक विवाहित और परिपक्व महिला है, जिसे कानून की पूरी समझ है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि वह शादी के झूठे वादे से धोखे में आई। आरोपी ने दावा किया कि संबंध पूरी तरह सहमति से थे और महिला बाद में उस पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी।

वहीं राज्य और महिला की ओर से कहा गया कि आरोपी ने पहले से योजना बनाकर महिला को झूठे वादे से संबंध बनाने के लिए प्रेरित किया और उसका भरोसा तोड़ा।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भूयान की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि कानून में शादी का झूठा वादा तभी अपराध माना जाएगा जब शुरुआत से ही आरोपी का इरादा धोखा देने का हो।

पीठ ने कहा, “हर टूटे रिश्ते को दुष्कर्म का मामला नहीं बनाया जा सकता। यह देखना जरूरी है कि सहमति धोखे से प्राप्त हुई थी या नहीं।”

अदालत ने यह भी माना कि शिकायतकर्ता उस समय कानूनी रूप से विवाह के लिए पात्र नहीं थी, क्योंकि उसका पहला विवाह अभी समाप्त नहीं हुआ था। अदालत ने स्पष्ट किया, “जब किसी व्यक्ति का पहला विवाह जीवित है, तब दूसरा विवाह कानूनन संभव नहीं होता। ऐसे में शादी के वादे को कानूनी रूप से लागू नहीं माना जा सकता।”

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पीठ ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता स्वयं अधिवक्ता है और उसे कानून की जानकारी होने की उम्मीद की जाती है।

सहमति और कानून पर अदालत का दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 376(2)(n) का उद्देश्य बार-बार किए गए यौन शोषण के मामलों में सख्त सजा देना है। लेकिन इस मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हुआ कि दोनों के बीच सहमति से संबंध बने और बाद में विवाद पैदा हुआ।

अदालत ने कहा, “सिर्फ संबंध खत्म होने या शादी न होने से उसे आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता। ऐसे मामलों में अदालतों को सावधानी बरतनी चाहिए ताकि गंभीर अपराधों की गंभीरता कम न हो।”

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि एफआईआर में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया रेप के अपराध को साबित नहीं करते। अदालत ने कहा कि इस मामले में आपराधिक मुकदमे को जारी रखना न्यायहित में नहीं होगा।

अंततः कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए संबंधित एफआईआर, चार्जशीट और सत्र न्यायालय में चल रही कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

Case Title: Pramod Kumar Navratna vs State of Chhattisgarh & Others

Case No.: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 4452 of 2025

Decision Date: 05 February 2026

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