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क्या फाइनल डिक्री पर स्टांप ड्यूटी देनी होगी? कलकत्ता हाईकोर्ट ने पार्टिशन मामले में दी अहम व्याख्या

Vivek G.
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सुब्रत नंदी बनाम कोलकाता कलेक्टर, स्टाम्प और राजस्व और अन्य। कलकत्ता हाईकोर्ट ने पार्टिशन की फाइनल डिक्री पर स्टांप ड्यूटी को सही ठहराया, कहा- अधिकार तय होना ही पर्याप्त है।

क्या फाइनल डिक्री पर स्टांप ड्यूटी देनी होगी? कलकत्ता हाईकोर्ट ने पार्टिशन मामले में दी अहम व्याख्या

कलकत्ता हाईकोर्ट में बुधवार को एक दिलचस्प सवाल पर सुनवाई पूरी हुई-क्या ऐसी अंतिम डिक्री (Final Decree), जिसमें संपत्ति का वास्तविक बंटवारा संभव न हो, फिर भी “पार्टिशन” यानी विभाजन मानी जाएगी और उस पर स्टांप ड्यूटी देनी होगी?

कलकत्ता हाईकोर्ट की मूल पीठ पर न्यायमूर्ति ओम नारायण राय ने इस सवाल का विस्तार से जवाब दिया और अंततः याचिका खारिज कर दी।

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मामले की पृष्ठभूमि

मामला 2013 में दायर एक सिविल सूट से शुरू हुआ था, जिसमें पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे की मांग की गई थी। पहले एक प्रारंभिक डिक्री (Preliminary Decree) पास हुई, जिसमें पक्षकारों के हिस्से तय कर दिए गए।

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बाद में कोर्ट ने एक कमिश्नर और स्ट्रक्चरल इंजीनियर नियुक्त किया। इंजीनियर की रिपोर्ट में साफ कहा गया कि संपत्ति जर्जर हालत में है और नक्शे के अनुसार उसका भौतिक बंटवारा संभव नहीं है।

इस बीच, मूल वादियों के निधन के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने संपत्ति की नीलामी की मांग की। लेकिन याचिकाकर्ता ने उनके हिस्से को बाजार मूल्य पर खरीदने का प्रस्ताव दिया। 5 अगस्त 2023 को बाकायदा रजिस्टर्ड बिक्री विलेख (Sale Deed) निष्पादित हुआ और उस पर स्टांप ड्यूटी भी अदा की गई।

29 नवंबर 2023 को अदालत ने अंतिम डिक्री पारित करते हुए कमिश्नर की रिपोर्ट और बिक्री विलेख को डिक्री का हिस्सा बना दिया।

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स्टांप ड्यूटी का विवाद

डिक्री तैयार होने के बाद उसे कलेक्टर, स्टांप एवं राजस्व कार्यालय को भेजा गया। कलेक्टर ने लगभग 2.61 लाख रुपये की स्टांप ड्यूटी लगाई-जिसमें एक हिस्सा बिक्री और दूसरा “पार्टिशन” के लिए था।

याचिकाकर्ता ने आपत्ति जताई कि बिक्री पर स्टांप ड्यूटी पहले ही दी जा चुकी है। बाद में कलेक्टर ने बिक्री संबंधी ड्यूटी हटा दी, लेकिन 45,000 रुपये “पार्टिशन” के नाम पर बनाए रखे।

यहीं से विवाद हाईकोर्ट पहुंचा।

याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि चूंकि संपत्ति का वास्तविक बंटवारा संभव नहीं था और कोई “मेट्स एंड बाउंड्स” के आधार पर हिस्सा अलग नहीं हुआ, इसलिए यह “इंस्ट्रूमेंट ऑफ पार्टिशन” नहीं माना जा सकता।

उनका कहना था, “जब वास्तविक विभाजन हुआ ही नहीं, तो स्टांप ड्यूटी किस बात की?”

उन्होंने यह भी कहा कि कोई नया अधिकार सृजित नहीं हुआ है, इसलिए ड्यूटी नहीं लगनी चाहिए।

राज्य की दलील

राज्य की ओर से कहा गया कि अंतिम डिक्री में पक्षकारों के हिस्से तय हो चुके हैं और कमिश्नर की रिपोर्ट डिक्री का हिस्सा है। इसलिए यह सिविल कोर्ट का “फाइनल ऑर्डर फॉर इफेक्टिंग पार्टिशन” है, जो स्टांप एक्ट के तहत ड्यूटी योग्य है।

राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “फाइनल डिक्री” का अर्थ सिर्फ भौतिक बंटवारा नहीं, बल्कि अधिकारों का अंतिम निर्धारण भी है।

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अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति ओम नारायण राय ने अपने फैसले में विस्तार से सिविल प्रक्रिया संहिता और भारतीय स्टांप अधिनियम की व्याख्या की।

अदालत ने कहा, “फाइनल डिक्री वह होती है जो पक्षकारों के अधिकारों को अंतिम रूप से निर्धारित कर देती है और मुकदमे को समाप्त करती है।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पार्टिशन के हर मामले में यह जरूरी नहीं कि संपत्ति का हर हिस्सा अलग-अलग कब्जे में दिया जाए। यदि पक्षकार किसी व्यवस्था को स्वीकार कर लेते हैं, तो वह भी अंतिम डिक्री मानी जाएगी।

फैसले में कहा गया, “पार्टियों ने विभाजन योजना और डिक्री को स्वीकार कर लिया है। ऐसे में अब यह कहना कि डिक्री ‘फाइनल ऑर्डर फॉर इफेक्टिंग पार्टिशन’ नहीं है, स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने यह भी जोड़ा कि स्टांप ड्यूटी “इंस्ट्रूमेंट” पर लगती है, न कि इस आधार पर कि नया अधिकार बना या नहीं।

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निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि अंतिम डिक्री भारतीय स्टांप अधिनियम की धारा 2(15) के तहत “इंस्ट्रूमेंट ऑफ पार्टिशन” की परिभाषा में आती है। इसलिए उस पर स्टांप ड्यूटी देय है।

कोर्ट ने कहा कि कलेक्टर का आदेश न तो मनमाना है, न अवैध और न ही अधिकार क्षेत्र से बाहर।

इसी के साथ, रिट याचिका खारिज कर दी गई। कोई लागत नहीं लगाई गई।

Case Title: Subrata Nundy vs. The Collector of Kolkata, Stamp and Revenue & Ors.

Case No.: WPO 506 of 2025

Decision Date: 18 February 2026

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