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जल प्रदूषण मामलों में शिकायतकर्ता की वैध अनुमति की जांच जरूरी, बिना प्राधिकरण अदालत संज्ञान नहीं ले सकती: राजस्थान हाईकोर्ट

Shivam
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राजस्थान उच्च न्यायालय ने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि जल अधिनियम के तहत कार्यवाही करने से पहले यह निर्धारित किया जाए कि क्या शिकायतकर्ता को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा विधिवत अधिकृत किया गया था। - प्रमोद जैन उर्फ ​​प्रमोद कुमार बनाम क्षेत्रीय अधिकारी, राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य।

जल प्रदूषण मामलों में शिकायतकर्ता की वैध अनुमति की जांच जरूरी, बिना प्राधिकरण अदालत संज्ञान नहीं ले सकती: राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने जल प्रदूषण से जुड़े एक आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण निर्देश जारी करते हुए कहा है कि किसी शिकायतकर्ता द्वारा दायर शिकायत पर आगे बढ़ने से पहले यह जांचना आवश्यक है कि उसे राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से विधिवत प्राधिकरण (Authorization) प्राप्त था या नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि शिकायतकर्ता के पास वैध प्राधिकरण नहीं था, तो संबंधित अदालत को मामले का संज्ञान लेने का अधिकार ही नहीं होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला प्रमोद जैन उर्फ प्रमोद कुमार द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत दर्ज कार्यवाही को चुनौती दी थी।

इससे पहले मजिस्ट्रेट द्वारा अपराध का संज्ञान लेने के आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर की गई थी। पुनरीक्षण अदालत ने संज्ञान आदेश को रद्द तो कर दिया, लेकिन पूरी कार्यवाही समाप्त करने के बजाय मामले को दोबारा विचार के लिए मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया। इसी आदेश से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता हाईकोर्ट पहुंचा।

न्यायमूर्ति फरजंद अली ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जब संज्ञान लेने का आदेश पहले ही निरस्त किया जा चुका है, तो मजिस्ट्रेट द्वारा मामले पर नए सिरे से विचार किया जाना उचित होगा।

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हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि आगे की कार्यवाही शुरू करने से पहले शिकायतकर्ता की योग्यता और कानूनी प्राधिकरण की जांच करना अनिवार्य है। न्यायालय ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा प्रथमदृष्टया सामग्री मौजूद है जिससे यह संकेत मिलता है कि शिकायत दर्ज करने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या उसके किसी अधिकृत अधिकारी द्वारा आवश्यक अनुमति प्रदान नहीं की गई थी।

अदालत ने कहा, “मजिस्ट्रेट को सबसे पहले यह स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज करना होगा कि शिकायतकर्ता शिकायत दायर करने के लिए सक्षम और विधिवत अधिकृत था या नहीं।”

हाईकोर्ट ने जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 49 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रावधान अनिवार्य प्रकृति का है। अदालत ने निर्देश दिया कि मजिस्ट्रेट यह जांच करे कि शिकायत दर्ज किए जाने से पहले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या उसके सक्षम अधिकारी द्वारा कोई वैध प्राधिकरण जारी किया गया था या नहीं।

न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत प्राधिकरण पत्र अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत अभियोजन शुरू करने की कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करता है, तो उसकी वैधता पर भी विचार किया जाना चाहिए।

याचिका का निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वह सबसे पहले शिकायतकर्ता की वैध प्राधिकरण संबंधी स्थिति पर स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज करे। अदालत ने कहा कि यदि शिकायत दर्ज होने के समय शिकायतकर्ता के पक्ष में वैध और कानूनी रूप से टिकाऊ प्राधिकरण मौजूद नहीं था, तो धारा 49 के तहत शिकायत विचारणीय नहीं रहेगी और आपराधिक अदालत को कथित अपराधों का संज्ञान लेने का अधिकार प्राप्त नहीं होगा।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि शिकायत पर अंतिम आदेश पारित होने तक याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई दंडात्मक या बलपूर्वक कार्रवाई नहीं की जाएगी।

Case Details:

Case Title: Pramod Jain @ Pramod Kumar v. The Regional Officer, Rajasthan State Pollution Control Board & Anr.

Case Number: S.B. Criminal Miscellaneous (Petition) No. 2299/2021

Judge: Justice Farjand Ali

Decision Date: 20 May 2026

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