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जाली दस्तावेज़ पर आधारित मध्यस्थता नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट ने ‘RDDHI Gold’ विवाद में साफ रुख अपनाया

Vivek G.
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राजिया बेगम बनाम बरनाली मुखर्जी - सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जब समझौता ही कथित तौर पर जाली हो तो विवाद मध्यस्थता के लिए नहीं जा सकते, और साझेदारी विवाद में हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।

जाली दस्तावेज़ पर आधारित मध्यस्थता नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट ने ‘RDDHI Gold’ विवाद में साफ रुख अपनाया

भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में साफ कहा है कि जब किसी विवाद की जड़ में मौजूद दस्तावेज़ की वैधता ही संदेह के घेरे में हो, तो ऐसे मामले को मध्यस्थता (Arbitration) के लिए नहीं भेजा जा सकता। अदालत ने यह टिप्पणी एक साझेदारी फर्म M/s RDDHI Gold से जुड़े लंबे चले विवाद में की, जहां कथित Admission Deed को जाली और मनगढ़ंत बताया गया था

Background of the Case

यह मामला राजिया बेगम बनाम बरनाली मुखर्जी के बीच साझेदारी विवाद से जुड़ा है। बरनाली मुखर्जी और दो अन्य साझेदारों ने वर्ष 2005 में M/s RDDHI Gold नाम से साझेदारी फर्म बनाई थी। राजिया बेगम का दावा था कि वर्ष 2007 में एक Admission Deed के जरिए उन्हें फर्म में 50.33% हिस्सेदारी मिली और अन्य साझेदारों ने सेवानिवृत्ति ले ली।

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हालांकि, बरनाली मुखर्जी ने इस दस्तावेज़ के अस्तित्व को ही सिरे से नकारते हुए कहा कि यह Admission Deed जाली है और कभी वैध रूप से अस्तित्व में ही नहीं आई। इसी कथित दस्तावेज़ के आधार पर राजिया बेगम ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 9, धारा 8 और धारा 11 के अंतर्गत अलग-अलग कार्यवाहियाँ की मांग की।

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Court Observations

सुप्रीम कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और पहले के आदेशों को ध्यान से देखते हुए कहा कि Admission Deed की प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल हैं। अदालत ने नोट किया कि:

• जिस दस्तावेज़ के आधार पर साझेदारी का दावा किया गया, वह लगभग नौ वर्षों तक किसी भी रिकॉर्ड में सामने नहीं आया।

• कथित सेवानिवृत्ति के बाद भी संबंधित व्यक्ति फर्म के कामकाज में सक्रिय रहा, जो दस्तावेज़ की शर्तों से मेल नहीं खाता।

• बैंकिंग और अन्य व्यावसायिक रिकॉर्ड में राजिया बेगम को साझेदार नहीं, बल्कि केवल गारंटर के रूप में दिखाया गया।

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पीठ ने टिप्पणी की,

“मध्यस्थता सहमति पर आधारित प्रक्रिया है। जब सहमति वाला दस्तावेज़ ही संदेह के घेरे में हो, तो मध्यस्थता का आधार ही समाप्त हो जाता है।”

इस मामले में हाई कोर्ट के दो अलग-अलग आदेश सामने आए थे-

एक में मध्यस्थ नियुक्त करने से इनकार किया गया, जबकि दूसरे में विवाद को मध्यस्थता के लिए भेज दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब निचली अदालत और अपीलीय अदालत दोनों यह मान चुकी हों कि धोखाधड़ी के आरोप गंभीर हैं, तो हाई कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप करना उचित नहीं था।

अदालत ने कहा,

“अनुच्छेद 227 की शक्तियां अपील के रूप में इस्तेमाल नहीं की जा सकतीं।”

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Decision

सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि:

• Admission Deed से जुड़े विवाद में धोखाधड़ी के आरोप इतने गंभीर हैं कि मामला फिलहाल मध्यस्थता योग्य नहीं है।

• हाई कोर्ट का वह आदेश, जिसमें विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजा गया था, रद्द किया जाता है।

• मध्यस्थ नियुक्त करने से इनकार करने वाला हाई कोर्ट का आदेश सही माना गया और उसे बरकरार रखा गया।

अंततः, एक अपील खारिज की गई जबकि दूसरी स्वीकार कर ली गई। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक कथित दस्तावेज़ की वैधता पर पूर्ण सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक मध्यस्थता की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती।

Case Title: Rajia Begum v. Barnali Mukherjee

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