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जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान प्रशासनिक निर्देश नहीं दे सकता हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश रद्द किए

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 483 के तहत बेल सुनवाई केवल आरोपी की रिहाई या हिरासत तक सीमित है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रशासनिक निर्देश रद्द। - रामबलक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान प्रशासनिक निर्देश नहीं दे सकता हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश रद्द किए

सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि बेल याचिका पर सुनवाई करते समय हाईकोर्ट की शक्तियां सीमित होती हैं और वह इस दौरान व्यापक प्रशासनिक या नीतिगत निर्देश जारी नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 483 के तहत बेल अधिकार क्षेत्र केवल यह तय करने तक सीमित है कि आरोपी को हिरासत में रखा जाए या रिहा किया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में वर्ष 2002 में दर्ज एक धोखाधड़ी और जालसाजी केस से जुड़ा था। आरोपी रामबलक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराएं 419, 420, 467, 468 और 471 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था। बाद में उसने दूसरी बार इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की, जिसे 1 अप्रैल 2025 को खारिज कर दिया गया।

हालांकि, बेल खारिज करते समय हाईकोर्ट ने सिर्फ जमानत पर फैसला नहीं दिया, बल्कि ट्रायल कोर्ट को समन जारी करने और कार्यवाही में देरी करने वालों के खिलाफ कठोर कदम उठाने के निर्देश भी दिए। इसके साथ ही कोर्ट ने पहले के मामलों - भंवर सिंह @ करमवीर बनाम राज्य उत्तर प्रदेश और जितेंद्र बनाम राज्य उत्तर प्रदेश - में जारी प्रशासनिक दिशानिर्देशों को भी दोहराया।

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हाईकोर्ट के निर्देश क्या थे?

इन निर्देशों की शुरुआत 2023 में हुई थी, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि उत्तर प्रदेश में समन और वारंट की तामील में भारी देरी हो रही है। इसके बाद राज्य सरकार और डीजीपी से जवाब मांगा गया। जवाब में राज्य सरकार ने कई प्रशासनिक उपाय सुझाए, जिनमें शामिल थे:

• हर जिले में एसपी रैंक के अधिकारी को नोडल अधिकारी नियुक्त करना

• समन और वारंट की निगरानी के लिए केंद्रीय रजिस्टर बनाना

• हर सप्ताह और हर महीने समीक्षा करना

• लापरवाही करने वाले अधिकारियों को चेतावनी और कारण बताओ नोटिस जारी करना

बाद में हाईकोर्ट ने इन सरकारी निर्देशों को न्यायिक आदेश का हिस्सा बना दिया।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

रामबलक ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की। प्रारंभ में मामला केवल बेल अस्वीकृति का लगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असली प्रश्न यह है कि क्या बेल अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए हाईकोर्ट ऐसे व्यापक निर्देश जारी कर सकता है।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनुरुद्ध मामले में दिए गए अपने पुराने फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि बेल सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट अपनी सीमाओं से बाहर जाकर प्रशासनिक आदेश नहीं दे सकता।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“संवैधानिक शक्तियां और वैधानिक शक्तियां अलग-अलग हैं। वैधानिक शक्ति केवल उसी सीमा तक इस्तेमाल की जा सकती है, जितनी कानून ने अनुमति दी हो।”

अदालत ने साफ किया कि धारा 483 BNSS के तहत हाईकोर्ट की शक्ति केवल बेल से जुड़े प्रश्न तक सीमित है। कोर्ट ने कहा:

“बेल अधिकार क्षेत्र का उद्देश्य केवल यह तय करना है कि आरोपी को मुकदमे के दौरान समाज में छोड़ा जाए या जेल में रखा जाए।”

अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा जारी उन निर्देशों को रद्द कर दिया, जो बेल आदेश के साथ प्रशासनिक रूप से लागू किए गए थे। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा पहले से लागू किए गए प्रशासनिक कदम जारी रह सकते हैं और सरकार जरूरत पड़ने पर उन्हें कानून के अनुरूप संशोधित कर सकती है।

साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने रामबलक को दी गई अंतरिम जमानत को स्थायी कर दिया और सभी लंबित अर्जियां निस्तारित कर दीं।

Case Title:- RAMBALAK Vs. STATE OF U.P.

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