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धारा 138 एनआई अधिनियम | चेक पर हस्ताक्षर न करने वाले संयुक्त खाताधारक पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

Shivam
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि संयुक्त बैंक खाते की सह-धारक, जिसने चेक पर हस्ताक्षर नहीं किए, उसे धारा 138 NI Act के तहत अभियुक्त नहीं बनाया जा सकता। - मधु सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य

धारा 138 एनआई अधिनियम | चेक पर हस्ताक्षर न करने वाले संयुक्त खाताधारक पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल संयुक्त बैंक खाते का सह-धारक होने भर से किसी व्यक्ति पर धारा 138, नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जब तक उसने विवादित चेक पर हस्ताक्षर न किए हों।

मामले की पृष्ठभूमि

शिकायतकर्ता हरि ओम पाठक ने आरोप लगाया था कि राहुल थिंद और मधु सिंह से उनके अच्छे संबंध थे। इसी भरोसे पर उन्होंने दिसंबर 2004 में व्यवसाय के लिए कुल 8 लाख रुपये उधार दिए थे। शिकायत के अनुसार, तय समय बीतने के बाद भी रकम वापस नहीं की गई।

बाद में राहुल थिंद ने दो चेक जारी किए, लेकिन बैंक में प्रस्तुत करने पर दोनों चेक “अकाउंट बंद” होने की टिप्पणी के साथ लौट आए। इसके बाद कानूनी नोटिस भेजा गया, मगर भुगतान नहीं हुआ।

ट्रायल कोर्ट ने 3 जुलाई 2006 को दोनों आरोपियों को धारा 138 NI Act के तहत तलब कर लिया था। इसी आदेश को मधु सिंह ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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मधु सिंह की ओर से कहा गया कि संबंधित बैंक खाता संयुक्त जरूर था, लेकिन चेक पर केवल राहुल थिंद के हस्ताक्षर थे। इसलिए उनके खिलाफ धारा 138 के तहत अपराध बनता ही नहीं है।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 141 के तहत “विकेरियस लाइबिलिटी” केवल कंपनियों और फर्मों पर लागू होती है, व्यक्तिगत संयुक्त खाताधारकों पर नहीं।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों - अपर्णा ए. शाह, जुगेश सहगल, अलका खांडू अवहाद और बिजॉय कुमार मोनी - का विस्तृत उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि कानून की स्थापित स्थिति यही है कि धारा 138 के तहत केवल वही व्यक्ति अभियोजन का सामना कर सकता है जिसने चेक जारी किया हो और उस पर हस्ताक्षर किए हों।

पीठ ने कहा,

“संयुक्त बैंक खाते के सह-धारकों पर केवल तभी अभियोजन चल सकता है जब उन्होंने भी विवादित चेक पर हस्ताक्षर किए हों।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायत में मधु सिंह की कोई विशेष भूमिका नहीं बताई गई थी। उनके खिलाफ केवल इतना कहा गया था कि वे कर्ज चुकाने के लिए संयुक्त रूप से जिम्मेदार थीं।

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट द्वारा मधु सिंह को समन जारी करना कानूनन टिकाऊ नहीं था। इसके साथ ही उनके खिलाफ लंबित पूरी कार्यवाही रद्द कर दी गई।

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि सह-आरोपी राहुल थिंद के खिलाफ मुकदमा कानून के अनुसार जारी रहेगा।

Case Details

Case Title: Madhu Singh vs State of U.P. and Others

Case Number: Application U/S 482 No. 19215 of 2007

Judge: Justice Sandeep Jain

Decision Date: May 6, 2026

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