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सिर्फ दो दिन की देरी, लेकिन बड़ी कानूनी चूक! सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस केस में पूरी कार्यवाही रद्द की

Vivek G.
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एस नागेश बनाम शोभा एस आराध्या, चेक बाउंस केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: देरी माफ किए बिना संज्ञान अवैध, पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द।

सिर्फ दो दिन की देरी, लेकिन बड़ी कानूनी चूक! सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस केस में पूरी कार्यवाही रद्द की

नई दिल्ली की अदालत कक्ष संख्या में माहौल गंभीर था। Supreme Court of India के सामने सवाल छोटा दिख रहा था-शिकायत दाखिल करने में सिर्फ दो दिन की देरी। लेकिन इसी देरी ने पूरे मुकदमे की नींव हिला दी। कोर्ट ने साफ किया कि कानून की तय प्रक्रिया से पहले कोई भी कदम उठाना स्वीकार्य नहीं है, चाहे देरी कितनी ही मामूली क्यों न हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कर्नाटक के मैसूर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता शोभा एस. अराध्या ने आरोप लगाया कि एस. नागेश ने उनसे ₹5.40 लाख उधार लिए थे। बाद में दिए गए चेक के बाउंस होने पर उन्होंने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज कराई।

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रिकॉर्ड के मुताबिक, कानूनी नोटिस के बावजूद भुगतान नहीं हुआ। इसके बाद 9 अक्टूबर 2013 को शिकायत दाखिल की गई और उसी दिन मजिस्ट्रेट ने संज्ञान भी ले लिया। हालांकि, बाद में यह सामने आया कि शिकायत तय समयसीमा से दो दिन देर से दाखिल हुई थी।

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मजिस्ट्रेट कोर्ट में देरी को बाद में सही ठहराते हुए इसे “बोनाफाइड” मान लिया गया। हाई कोर्ट ने भी यही रुख अपनाया और कहा कि पहले संज्ञान लिया गया हो या पहले देरी माफ की गई हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आरोपी एस. नागेश ने इसी आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की जड़ पर हाथ रखा। अदालत ने कहा कि कानून बिल्कुल स्पष्ट है। अगर शिकायत समयसीमा के बाद दाखिल हुई है, तो पहले देरी माफ करना अनिवार्य है, उसके बाद ही संज्ञान लिया जा सकता है।

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पीठ ने टिप्पणी की,

“प्रावधान की भाषा साफ है। देरी को माफ किए बिना लिया गया संज्ञान कानून की नजर में टिक नहीं सकता।”

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि शिकायतकर्ता ने अपनी अर्जी में यह कहा था कि शिकायत समय पर दाखिल हुई, जबकि ऐसा नहीं था। यही चूक पूरे मामले पर भारी पड़ गई।

कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को पलटते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा देरी माफ किए बिना संज्ञान लेना एक गंभीर त्रुटि थी। यह कोई साधारण तकनीकी गलती नहीं, बल्कि प्रक्रिया का उल्लंघन है।

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नतीजतन, अदालत ने चेक बाउंस से जुड़ी पूरी शिकायत और उससे पैदा हुई आपराधिक कार्यवाही को रद्द (क्वैश) कर दिया। अपील स्वीकार कर ली गई और आरोपी को राहत मिली।

Case Title: S. Nagesh vs Shobha S. Aradhya

Case No.: Criminal Appeal (@ SLP (Crl.) No. 18127 of 2024)

Decision Date: 6 January 2026

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