Logo

कर्नाटक हाई कोर्ट ने SC/ST मामले में FIR रद्द करने से किया इनकार, कहा-देरी और श्रम विवाद ट्रायल में तय होंगे

Shivam
Add Court Book as a preferred source on Google

कर्नाटक हाई कोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार किया, कहा देरी और श्रमिक विवाद जैसे मुद्दे ट्रायल में तय होंगे। - श्याम मेहता एवं अन्य। बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने SC/ST मामले में FIR रद्द करने से किया इनकार, कहा-देरी और श्रम विवाद ट्रायल में तय होंगे

धारवाड़ बेंच में सुनवाई के दौरान कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक अहम आदेश में यह स्पष्ट किया कि केवल देरी या श्रमिक विवाद का हवाला देकर SC/ST एक्ट के मामले को शुरुआती चरण में खत्म नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है, इसलिए ट्रायल जरूरी है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला श्‍याम मेहता बनाम राज्य कर्नाटक से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने FIR रद्द करने की मांग की थी। FIR में आरोप था कि फैक्ट्री के मालिकों ने एक कर्मचारी को उसकी जाति को लेकर अपमानित किया और धमकी दी।

शिकायत के अनुसार, घटना अप्रैल 2024 में हुई थी, जबकि FIR अक्टूबर 2024 में दर्ज कराई गई। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह देरी और श्रमिक यूनियन विवाद के कारण दर्ज झूठा मामला है।

Read also:- पटना उच्च न्यायालय ने ‘निराशा के सिद्धांत’ का हवाला देते हुए विवाह भंग किया, पारिवारिक न्यायालय के अमान्यता संबंधी फैसले को पलट दिया।

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत में कहा कि:

• शिकायत छह महीने की देरी से दर्ज हुई है, जो संदेह पैदा करती है

• फैक्ट्री में पहले से श्रमिक विवाद चल रहा था

• घटना निजी परिसर में हुई, इसलिए “पब्लिक व्यू” का तत्व नहीं बनता

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि SC/ST एक्ट का दुरुपयोग किया गया है और मामला अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

न्यायमूर्ति हंचाटे संजीवकुमार ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा:

“सिर्फ देरी के आधार पर शिकायत को झूठा नहीं कहा जा सकता; यह ट्रायल के दौरान जांच का विषय है।”

Read also:- दिल्ली हाई कोर्ट: अरविंद केजरीवाल का सार्वजनिक आश्वासन कानूनन बाध्यकारी नहीं, बिना नीति सरकार पर नहीं बनती जिम्मेदारी

अदालत ने यह भी माना कि एक मजदूर अपने नियोक्ता के खिलाफ तुरंत शिकायत दर्ज कराने से हिचक सकता है, क्योंकि उसे नौकरी खोने का डर हो सकता है।

“पब्लिक व्यू” पर अदालत ने महत्वपूर्ण स्पष्टता दी:

“पब्लिक व्यू का मतलब केवल सार्वजनिक स्थान नहीं है; यदि अन्य कर्मचारी घटना देख सकते हैं, तो वह भी पब्लिक व्यू माना जाएगा।”

अदालत ने यह भी कहा कि श्रमिक यूनियन का विवाद और व्यक्तिगत शिकायत अलग-अलग मुद्दे हैं।

“सिर्फ इसलिए कि हड़ताल का नोटिस दिया गया था, यह नहीं कहा जा सकता कि शिकायत उसी से जुड़ी है।”

Read also:- कानूनी रिसर्च और आदेश समझने में देरी का बहाना नहीं चलेगा: दिल्ली हाई कोर्ट ने 1 साल बाद दाखिल याचिका खारिज की

यह भी कहा गया कि ऐसे तथ्यात्मक विवादों का निर्णय ट्रायल के दौरान ही संभव है।

सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद अदालत ने पाया कि:

• शिकायत में प्रथम दृष्टया अपराध के तत्व मौजूद हैं

• देरी और अन्य परिस्थितियाँ ट्रायल में परखी जाएंगी

• मामला इस स्तर पर रद्द करने योग्य नहीं है

अंततः, हाई कोर्ट ने FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी और कहा कि मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में जारी रहेगी।

Case Details

Case Title: Shyam Mehta & Ors. v. State of Karnataka & Anr.

Case Number: Criminal Petition No. 100213 of 2025

Judge: Justice Hanchate Sanjeevkumar

Decision Date: 2 April 2026

Download Order

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates