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विभागीय जांच शुरू होने के बाद दर्ज SC/ST एक्ट शिकायत प्रतिशोधात्मक प्रतीत हुई: कर्नाटक हाईकोर्ट ने कंपनी अधिकारियों के खिलाफ मामला रद्द किया

Shivam
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने कंपनी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज SC/ST एक्ट FIR रद्द करते हुए कहा कि शिकायत विभागीय कार्रवाई के बाद दर्ज हुई और रिकॉर्ड से प्रतिशोध की आशंका दिखाई देती है।

विभागीय जांच शुरू होने के बाद दर्ज SC/ST एक्ट शिकायत प्रतिशोधात्मक प्रतीत हुई: कर्नाटक हाईकोर्ट ने कंपनी अधिकारियों के खिलाफ मामला रद्द किया

कर्नाटक हाईकोर्ट ने मालनाड अलॉय कास्टिंग्स प्राइवेट लिमिटेड के पांच अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम और अन्य धाराओं के तहत आपराधिक मामला रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद घटनाक्रम से यह प्रतीत होता है कि शिकायत कंपनी द्वारा शुरू की गई विभागीय कार्रवाई के बाद दर्ज कराई गई थी और मामले को आगे बढ़ाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने दोनों आपराधिक याचिकाओं को स्वीकार करते हुए शिवमोग्गा जिले के भद्रावती पुलिस स्टेशन में दर्ज Crime No. 39/2025 को याचिकाकर्ताओं के संबंध में रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला मालनाड अलॉय कास्टिंग्स प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है, जहां शिकायतकर्ता लगभग 18 वर्षों से उत्पादन विभाग में कार्यरत था। कंपनी का आरोप था कि नवंबर 2024 में उसकी ड्यूटी के दौरान हुई कथित लापरवाही के कारण उत्पादन में नुकसान हुआ।

इसके बाद कंपनी ने दिसंबर 2024 में उसे कारण बताओ नोटिस (शो-कॉज नोटिस) जारी किया। कर्मचारी ने नोटिस का जवाब देते हुए सभी आरोपों से इनकार किया। कंपनी को जवाब संतोषजनक नहीं लगा और उसने विभागीय जांच के लिए एक जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया।

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इस बीच कर्मचारी ने औद्योगिक न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया और शो-कॉज नोटिस को चुनौती देते हुए यह भी आरोप लगाया कि उसके साथ जाति आधारित भेदभाव किया गया है। हालांकि न्यायाधिकरण ने तत्काल अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया और कंपनी को नोटिस जारी किया।

इसके कुछ सप्ताह बाद, 19 फरवरी 2025 को कर्मचारी ने कंपनी के प्रबंध निदेशक, कार्यकारी निदेशक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी और अन्य अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में जातिसूचक अपमान, धमकी और मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए गए, जिसके आधार पर पुलिस ने FIR दर्ज कर ली।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूरे घटनाक्रम का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता लगभग 18 वर्षों से कंपनी में कार्यरत था और विभागीय कार्रवाई शुरू होने से पहले उसने कभी भी इस प्रकार के जातिसूचक अपमान या उत्पीड़न की कोई शिकायत नहीं की थी।

न्यायमूर्ति नागप्रसन्ना ने कहा कि घटनाओं की श्रृंखला पर नजर डालने से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि शिकायत विभागीय जांच और शो-कॉज नोटिस के बाद दर्ज कराई गई।

अदालत ने कहा, “घटनाक्रम को समग्र रूप से देखने पर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि शिकायतकर्ता ने विभागीय जांच और शो-कॉज नोटिस जारी किए जाने के कारण प्रतिशोध की भावना से यह आपराधिक मामला दर्ज कराया है।”

कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि पुलिस ने शिकायत की सत्यता की प्रारंभिक जांच किए बिना गंभीर प्रावधानों के तहत मामला कैसे दर्ज कर लिया।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के गुलाम मुस्तफा बनाम कर्नाटक राज्य और हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य मामलों का उल्लेख किया।

अदालत ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों को सुरक्षा प्रदान करना है, लेकिन यदि रिकॉर्ड से यह दिखाई दे कि मामला व्यक्तिगत विवाद या अन्य कारणों से दर्ज किया गया है और कानून का दुरुपयोग हो रहा है, तो उच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि केवल शिकायतकर्ता का अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय से होना पर्याप्त नहीं है। यह भी दिखना चाहिए कि कथित कृत्य विशेष रूप से उसकी जाति के कारण किया गया था।

सभी तथ्यों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया अपराध का मामला स्थापित नहीं करते हैं और आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्याय के हित में नहीं होगा।

अदालत ने कहा कि मामला एससी/एसटी एक्ट और आपराधिक कानून के प्रावधानों के दुरुपयोग का उदाहरण प्रतीत होता है।

इसी आधार पर न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने दोनों आपराधिक याचिकाओं को स्वीकार करते हुए Crime No. 39/2025 को याचिकाकर्ताओं के संबंध में रद्द कर दिया और उनके खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाहियों को समाप्त कर दिया।

Case Details

Case Title: B.S. Jagadish & Ors. v. State of Karnataka & Anr. (connected with Madhukar Jois Y.V. & Anr. v. State of Karnataka & Anr.)

Case Number: Criminal Petition No. 3478 of 2025 c/w Criminal Petition No. 2990 of 2025

Judge: Justice M. Nagaprasanna

Decision Date: June 4, 2026

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