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कर्नाटक हाईकोर्ट ने नसीर अहमद के खिलाफ धारा 323 IPC की कार्यवाही रद्द की, कहा- चोट का कोई सबूत नहीं

Vivek G.
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श्री नसीर अहमद बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य, कर्नाटक हाईकोर्ट ने नसीर अहमद के खिलाफ IPC धारा 323 की कार्यवाही रद्द की, कहा- चोट का कोई मेडिकल सबूत नहीं, इसलिए अपराध सिद्ध नहीं होता।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने नसीर अहमद के खिलाफ धारा 323 IPC की कार्यवाही रद्द की, कहा- चोट का कोई सबूत नहीं

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में विधान परिषद सदस्य नसीर अहमद के खिलाफ दर्ज मामले में आंशिक राहत देते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 323 (मारपीट से चोट पहुंचाना) से संबंधित कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि शिकायतकर्ता को वास्तव में चोट पहुंची थी।

यह आदेश जस्टिस एस सुनील दत्त यादव की एकल पीठ ने पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 10 जुलाई 2019 को बेंगलुरु स्थित विधान सौधा परिसर में हुई एक घटना से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार उस दिन एक विधायक स्पीकर को अपना इस्तीफा देने के लिए जा रहे थे।

आरोप था कि उसी दौरान कुछ लोगों ने उन्हें रोक लिया, खींचकर मंत्री के कक्ष की ओर ले गए और उनके साथ मारपीट की। इस घटना के बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया और जांच पूरी होने के बाद आरोपपत्र दाखिल कर दिया।

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चार्जशीट में नसीर अहमद को भारतीय दंड संहिता की धारा 323 (चोट पहुंचाना) और धारा 341 (गलत तरीके से रोकना) के तहत आरोपी बनाया गया था।

अदालत में क्या दलीलें दी गईं

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि चार्जशीट में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने शिकायतकर्ता को चोट पहुंचाई थी।

उन्होंने यह भी कहा कि कथित हमले के समर्थन में कोई मेडिकल रिकॉर्ड या जख्म का प्रमाणपत्र (वाउंड सर्टिफिकेट) पेश नहीं किया गया। इसलिए धारा 323 IPC के आवश्यक तत्व ही पूरे नहीं होते।

याचिकाकर्ता ने अदालत से केवल धारा 323 के आरोप को रद्द करने की मांग की, जबकि धारा 341 के मामले में ट्रायल कोर्ट के समक्ष उचित समय पर अपना पक्ष रखने की स्वतंत्रता मांगी।

अदालत की प्रमुख टिप्पणी

अदालत ने मामले की चार्जशीट और गवाहों के बयान का अध्ययन करने के बाद कहा कि धारा 323 IPC लागू होने के लिए यह साबित होना जरूरी है कि किसी व्यक्ति को वास्तव में चोट पहुंचाई गई हो।

पीठ ने कहा: “Section 323 के लिए यह आवश्यक है कि चोट पहुंचाई गई हो। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई मेडिकल दस्तावेज या गवाही नहीं है जिससे यह साबित हो कि शिकायतकर्ता को चोट लगी थी।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता के बयान में केवल इतना कहा गया था कि उन्हें खींचा गया, रोका गया और धक्का-मुक्की हुई। लेकिन चोट लगने की कोई पुष्टि नहीं मिली।

पीठ ने कहा कि जब चोट का कोई प्रमाण नहीं है तो धारा 323 IPC के तहत अपराध बनता ही नहीं।

अदालत का फैसला

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 323 IPC के तहत कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

अदालत ने आदेश दिया कि बेंगलुरु के XLII अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित मामले में धारा 323 IPC से संबंधित कार्यवाही रद्द की जाती है।

हालांकि, धारा 341 IPC से संबंधित आरोपों पर याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट के समक्ष उचित चरण पर अपना पक्ष रखने की स्वतंत्रता दी गई है।

इस प्रकार, याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए अदालत ने धारा 323 IPC की कार्यवाही समाप्त कर दी।

Case Title: Sri Naseer Ahmed v. State of Karnataka & Another

Case No.: Criminal Petition No. 14932 of 2025

Decision Date: 26 February 2026

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