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कर्नाटक हाईकोर्ट ने KSRTC गार्ड की बर्खास्तगी रद्द की, कहा- बिना जांच 'कलंकित' आदेश अस्वीकार्य

Vivek G.
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श्री संजूकुमार पुत्र ईश्वर कम्मार बनाम मंडल नियंत्रक, एनडब्ल्यूकेआरटीसी और अन्य। कर्नाटक हाईकोर्ट ने KSRTC सुरक्षा गार्ड की बर्खास्तगी रद्द की, कहा– फर्जी दस्तावेज आरोप में बिना विभागीय जांच सेवा समाप्ति अवैध।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने KSRTC गार्ड की बर्खास्तगी रद्द की, कहा- बिना जांच 'कलंकित' आदेश अस्वीकार्य

कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ पीठ ने एक अहम फैसले में केएसआरटीसी (KSRTC) के सुरक्षा गार्ड की सेवा समाप्ति का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि यदि किसी कर्मचारी पर फर्जी दस्तावेज देने का आरोप है, तो उसे हटाने से पहले विधिसम्मत विभागीय जांच और सुनवाई का मौका देना जरूरी है।

यह आदेश न्यायमूर्ति के.एस. हेमलेखा ने 10 फरवरी 2026 को पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता संजुकुमार, जिनकी नियुक्ति उनके पिता के निधन के बाद अनुकंपा आधार पर हुई थी, केएसआरटीसी में सुरक्षा गार्ड (ग्रुप-3) के पद पर कार्यरत थे। नियुक्ति से पहले दस्तावेज सत्यापन और शारीरिक परीक्षण भी हुआ था।

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सेवा के दौरान उन्हें एक कारण बताओ नोटिस मिला। निगम का आरोप था कि उन्होंने शैक्षणिक योग्यता से जुड़े फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किए और संबंधित सेमेस्टर परीक्षा में उपस्थित नहीं हुए थे।

इसके बाद 13 दिसंबर 2024 को निगम ने उनकी सेवा समाप्त कर दी।

याचिकाकर्ता का कहना था कि न तो कोई विभागीय जांच हुई और न ही उन्हें आरोपों का जवाब देने का प्रभावी अवसर दिया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि यह आदेश “साधारण समाप्ति” नहीं, बल्कि दंडात्मक (punitive) है क्योंकि इसमें गलत आचरण का आरोप लगाया गया है।

अदालत में कहा गया कि “जब आदेश में कर्मचारी पर गलत बयानी का आरोप लगाया गया हो, तो उसे बिना जांच हटाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।”

उन्होंने यह भी कहा कि कथित सत्यापन रिपोर्ट की प्रति उन्हें कभी उपलब्ध नहीं कराई गई।

निगम का पक्ष

निगम की ओर से तर्क दिया गया कि यदि नियुक्ति फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मिली हो, तो नियमों के अनुसार उसे रद्द किया जा सकता है। निगम ने कहा कि नियुक्ति की शर्तों में यह स्पष्ट है कि दस्तावेज गलत पाए जाने पर सेवा समाप्त की जा सकती है।

हालांकि, अदालत ने इस तर्क को अंतिम रूप से स्वीकार नहीं किया।

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अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति हेमलेखा ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि सेवा समाप्ति का आधार “फर्जी दस्तावेज” का आरोप है।

अदालत ने कहा, “जब आदेश में कदाचार (misconduct) का आरोप हो और उससे कर्मचारी की छवि प्रभावित होती हो, तो वह आदेश दंडात्मक माना जाएगा। ऐसे में विभागीय जांच अनिवार्य है।”

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि अदालत केवल आदेश के शब्दों को नहीं, बल्कि उसके वास्तविक स्वरूप को देखती है। यदि आदेश दिखने में साधारण हो, लेकिन वास्तव में दंड देने के उद्देश्य से पारित किया गया हो, तो उसे जांच के बिना बरकरार नहीं रखा जा सकता।

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता को न तो जांच का मौका दिया गया और न ही आरोपों का समुचित जवाब देने का अवसर।

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निर्णय

इन तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने 13 दिसंबर 2024 का सेवा समाप्ति आदेश रद्द कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि:

• याचिकाकर्ता को सेवा में पुनः बहाल किया जाए।

• निगम चाहे तो विधि अनुसार विभागीय जांच शुरू कर सकता है, बशर्ते उचित सुनवाई का अवसर दिया जाए।

• पुनर्बहाली के बाद वेतन और अन्य लाभ देय होंगे, हालांकि अंतिम अधिकार जांच के परिणाम पर निर्भर करेगा।

अदालत ने स्पष्ट किया कि वह आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दे रही है।

Case Title: Shri Sanjukumar S/o Ishwar Kammar vs Divisional Controller, NWKRTC & Anr.

Case No.: W.P. No. 101353 of 2025

Decision Date: 10 February 2026

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