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घरेलू हिंसा अधिनियम: केरल हाईकोर्ट ने कहा- मैजिस्ट्रेट अपने आदेश की गलती खुद सुधार सकता है, संपत्ति पर लगी रोक हटाई

Shivam
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केरल हाईकोर्ट ने कहा कि मैजिस्ट्रेट अपने आदेश में सुधार कर सकता है और गलत तरीके से लगाई गई संपत्ति पर रोक को हटाने का अधिकार रखता है। - एन.के. प्रसन्नान और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य।

घरेलू हिंसा अधिनियम: केरल हाईकोर्ट ने कहा- मैजिस्ट्रेट अपने आदेश की गलती खुद सुधार सकता है, संपत्ति पर लगी रोक हटाई

केरल हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में साफ किया है कि यदि कोर्ट के आदेश से किसी पक्ष को अनुचित नुकसान होता है, तो वही कोर्ट उस गलती को सुधारने के लिए अपने आदेश में बदलाव कर सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला Crl.Rev.Pet No. 555/2025 से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी खरीदी हुई जमीन पर भी रोक (injunction) लगा दी गई थी।

मामले की शुरुआत तब हुई जब महिला और उसके बच्चों ने घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 के तहत राहत मांगते हुए याचिका दायर की। इस पर मैजिस्ट्रेट ने 18.95 आर (ares) जमीन पर किसी भी तरह के लेन-देन या बदलाव पर रोक लगा दी।

हालांकि, याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस जमीन का एक हिस्सा उन्होंने वैध तरीके से खरीदा था, जो मूल विवाद से अलग था।

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सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों का विस्तार से परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि संबंधित 2.43 आर जमीन वास्तव में याचिकाकर्ताओं के नाम पर वैध रूप से ट्रांसफर हो चुकी थी और उस पर रोक लगाना उचित नहीं था।

न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत पर जोर दिया-

“Actus Curiae Neminem Gravabit”, यानी कोर्ट की गलती से किसी को नुकसान नहीं होना चाहिए।

बेंच ने कहा,

“यदि कोर्ट के आदेश से किसी पक्ष को नुकसान हुआ है, तो उसी कोर्ट का कर्तव्य है कि वह उस गलती को सुधार करे।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मैजिस्ट्रेट के पास यह अधिकार है कि वह अपने ही आदेश को संशोधित या रद्द कर सके, यदि वह आदेश किसी अन्य व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित कर रहा हो।

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उस तर्क को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि डीवी एक्ट के तहत संपत्ति के अधिकार तय नहीं किए जा सकते और याचिकाकर्ताओं को सिविल कोर्ट जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा,

“याचिकाकर्ताओं ने केवल अपने हिस्से की संपत्ति पर लगी रोक हटाने की मांग की थी, न कि किसी टाइटल डिक्लेरेशन की।”

अदालत ने माना कि मैजिस्ट्रेट ने अपने अधिकार का सही उपयोग नहीं किया और याचिकाकर्ताओं को अनावश्यक रूप से दूसरे मंच पर जाने के लिए कहा।

अंततः केरल हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ताओं की अर्जी स्वीकार कर ली।

कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा खरीदी गई 2.43 आर जमीन पर लगाया गया प्रतिबंध (injunction) हटाया जाए।

Case Details

Case Title: N.K. Prasannan & Anr. vs State of Kerala & Ors.

Case Number: Crl.R.P. No. 555 of 2025

Judge: Justice C. Pratheep Kumar

Decision Date: 10 March 2026

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