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खनन लीज़ विवाद में डालमिया सीमेंट को राहत: बॉम्बे हाईकोर्ट ने दो साल की पूरी LOI अवधि देने का आदेश

Shivam
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डालमिया सीमेंट (भारत) लिमिटेड बनाम भारत संघ और अन्य - बॉम्बे उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि महाराष्ट्र को डालमिया सीमेंट को खनन पट्टा निष्पादन के लिए पूरे दो साल का विस्तार देना होगा, और संक्षिप्त लीज अवधि को अस्वीकार कर दिया।

खनन लीज़ विवाद में डालमिया सीमेंट को राहत: बॉम्बे हाईकोर्ट ने दो साल की पूरी LOI अवधि देने का आदेश

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने खनन लीज़ से जुड़े एक अहम मामले में डालमिया सीमेंट (भारत) लिमिटेड के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कंपनी को आशय-पत्र (Letter of Intent – LOI) की अवधि केवल कुछ महीनों के लिए बढ़ाई गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत पात्र होने पर दो साल की पूरी विस्तार अवधि देना अनिवार्य है, न कि आंशिक।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला डालमिया सीमेंट (भारत) लिमिटेड से जुड़ा है, जिसने चंद्रपुर जिले के गोजोली खनिज ब्लॉक में चूना पत्थर की खनन लीज़ के लिए बोली प्रक्रिया में हिस्सा लिया था। कंपनी को 2020 में आशय-पत्र जारी किया गया था, जिसकी वैधता तीन वर्ष की थी और नियमों के अनुसार विशेष परिस्थितियों में इसे दो वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।

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हालांकि, वन भूमि की स्थिति में बदलाव, वन्यजीव अभयारण्य की अधिसूचना, पर्यावरणीय मंज़ूरियों में देरी और अन्य वैधानिक कारणों से खनन लीज़ के लिए आवश्यक औपचारिकताएं समय पर पूरी नहीं हो सकीं। कंपनी ने 2023 में ही दो साल के विस्तार के लिए आवेदन कर दिया था।

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राज्य सरकार का रुख

महाराष्ट्र सरकार ने 2025 में विस्तार देने पर सहमति जताई, लेकिन उसे पूरे दो साल देने के बजाय केवल सितंबर 2025 तक सीमित कर दिया। राज्य का तर्क था कि LOI की कुल अवधि, विस्तार सहित, पाँच साल से अधिक नहीं हो सकती।

इसी निर्णय को चुनौती देते हुए कंपनी ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

अदालत की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति अनिल एस. किलोर और न्यायमूर्ति रजनीश आर. व्यास की पीठ ने खनिज (नीलामी) नियम, 2015 के नियम 10 की व्याख्या करते हुए कहा कि यदि देरी के कारण कंपनी के नियंत्रण से बाहर हैं, तो राज्य सरकार को दो साल की पूरी विस्तार अवधि देनी होगी।

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पीठ ने कहा,

“यदि प्राधिकरण यह मान ले कि देरी कंपनी के नियंत्रण से बाहर थी, तो विस्तार की अवधि घटाई नहीं जा सकती।”

अदालत ने यह भी साफ किया कि नियम में “दो वर्ष तक” नहीं, बल्कि “दो वर्ष का विस्तार” शब्द प्रयोग किया गया है, जिससे राज्य सरकार को अवधि कम करने का कोई विवेकाधिकार नहीं मिलता।

कानूनी व्याख्या पर जोर

हाईकोर्ट ने उद्देश्यपरक व्याख्या (Purposive Interpretation) के सिद्धांत को अपनाते हुए कहा कि नियमों का उद्देश्य सफल बोलीदाता को सभी वैधानिक औपचारिकताएं पूरी करने का वास्तविक अवसर देना है। यदि विस्तार को आंशिक किया जाए, तो यह नियम के उद्देश्य को ही विफल कर देगा।

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पीठ ने यह भी माना कि राज्य सरकार की व्याख्या से नियम का दूसरा प्रावधान अर्थहीन हो जाता है, जो स्वीकार्य नहीं है।

अदालत का अंतिम निर्णय

अंततः, हाईकोर्ट ने:

• 1 सितंबर 2025 को जारी राज्य सरकार के अस्वीकार आदेश को रद्द कर दिया।

• 4 अप्रैल 2025 के उस पत्र को भी आंशिक रूप से निरस्त कर दिया, जिसमें दो साल से कम अवधि का विस्तार दिया गया था।

• महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि वह डालमिया सीमेंट को पूरे दो साल का विस्तार प्रदान करे, ताकि कंपनी खनन लीज़ के लिए आवश्यक शर्तें पूरी कर सके।

इस प्रकार, अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि कानून के तहत दिए गए अधिकारों को प्रशासनिक व्याख्या के ज़रिये सीमित नहीं किया जा सकता।

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