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लंबित आपराधिक मामलों के चलते वकील नामांकन पर रोक: मद्रास हाईकोर्ट ने बड़े मुद्दे को बड़ी पीठ को सौंपा

Shivam
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एस. भास्करपंडियन बनाम अध्यक्ष/सचिव, तमिलनाडु बार काउंसिल - मद्रास उच्च न्यायालय ने लंबित एफआईआर के कारण अधिवक्ताओं के नामांकन पर रोक पर सवाल उठाया, कहा कि न्यायालय अधिवक्ता अधिनियम से परे अयोग्यताएं नहीं जोड़ सकते।

लंबित आपराधिक मामलों के चलते वकील नामांकन पर रोक: मद्रास हाईकोर्ट ने बड़े मुद्दे को बड़ी पीठ को सौंपा

मदुरै पीठ, मद्रास हाईकोर्ट में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने वकीलों के नामांकन और लंबित आपराधिक मामलों के बीच लंबे समय से चले आ रहे कानूनी विवाद को फिर से केंद्र में ला दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि कानून में जो लिखा है, अदालत उससे आगे जाकर नई अयोग्यताएँ नहीं जोड़ सकती। लेकिन साथ ही, पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों से टकराव के कारण इस अहम सवाल को अब बड़ी पीठ के सामने भेज दिया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता एस. भास्करपांडियन ने वर्ष 1984 में कानून की पढ़ाई पूरी की थी। उस समय वे सरकारी सेवा में थे और बाद में ग्राम प्रशासनिक अधिकारी के रूप में कार्यरत रहे। सेवा से 30 जनवरी 2014 को सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने तमिलनाडु बार काउंसिल में वकील के रूप में नामांकन के लिए आवेदन किया।

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लेकिन उनके खिलाफ दो आपराधिक मामलों में एफआईआर लंबित होने के कारण बार काउंसिल ने आवेदन पर कार्रवाई नहीं की। इन मामलों में अब तक न तो चार्जशीट दाखिल हुई है और न ही ट्रायल शुरू हुआ। इसी आधार पर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति आर. कलैमाथी की पीठ ने विस्तार से इस मुद्दे की कानूनी स्थिति पर विचार किया। कोर्ट ने याद दिलाया कि पहले एस.एम. अनंथा मुरुगन मामले में एकल न्यायाधीश ने निर्देश दिया था कि गंभीर आपराधिक मामलों में फंसे कानून स्नातकों को नामांकन न दिया जाए। बाद में इस निर्देश को फुल बेंच ने भी अस्थायी उपाय के रूप में स्वीकार किया था।

हालांकि, वर्तमान पीठ ने एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 24A की ओर इशारा करते हुए कहा कि नामांकन से रोक केवल दोषसिद्धि (conviction) के मामलों में लागू होती है, न कि केवल आरोप या लंबित एफआईआर के आधार पर।

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पीठ ने टिप्पणी की,

“जब संसद द्वारा बनाया गया स्पष्ट कानून मौजूद है, तो रिट अदालत उसमें नई अयोग्यताएँ जोड़ नहीं सकती।”

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि आपराधिक कानून का मूल सिद्धांत “निर्दोषता की presumption” है और केवल आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति के पेशेवर अधिकार छीने नहीं जा सकते।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पेशे पर प्रतिबंध तभी लगाया जा सकता है जब वह कानून या नियमों में स्पष्ट रूप से लिखा हो। अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ मामले का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा कि न्यायपालिका विधायिका की भूमिका नहीं निभा सकती।

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साथ ही, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एक न्यायिक आदेश को एडवोकेट्स एक्ट की धारा 34 के तहत बनाए गए नियमों के बराबर नहीं माना जा सकता। पीठ के अनुसार, नियम बनाना विधायी प्रक्रिया है, न कि न्यायिक आदेश का परिणाम।

अंतिम निर्णय

इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद, मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने माना कि पहले दिए गए निर्देशों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। लेकिन चूंकि उन निर्देशों को पहले ही डिवीजन बेंच और फुल बेंच का समर्थन मिल चुका है, इसलिए वर्तमान पीठ ने कोई विपरीत आदेश पारित नहीं किया।

अंततः कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस पूरे मुद्दे को बड़ी पीठ के गठन पर विचार के लिए माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए।

Case Title: S. Bhaskarapandian v. The Chairman/Secretary, Bar Council of Tamil Nadu

Case Number: W.P.(MD) No. 6986 of 2015

Date of Decision: 7 January 2026

Counsel for Petitioner: Mr. V.P. Rajan

Counsel for Respondent: Mr. C. Susikumar

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