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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इंस्टाग्राम एन्क्रिप्शन मामले में याचिकाकर्ता को पहले डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड जाने को कहा

Shivam
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इंस्टाग्राम एन्क्रिप्शन विवाद में याचिकाकर्ता को पहले डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड जाने को कहा और बोर्ड को 15 दिन में निर्णय देने का निर्देश दिया।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इंस्टाग्राम एन्क्रिप्शन मामले में याचिकाकर्ता को पहले डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड जाने को कहा

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने गुरुवार को इंस्टाग्राम की एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन सेवा खत्म करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर तुरंत सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को पहले भारत का डेटा संरक्षण बोर्ड (DPBI) के समक्ष अपनी आपत्ति रखने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

इंदौर स्थित वकील पार्थ शर्मा ने एक जनहित याचिका दायर की थी। इसमें इंस्टाग्राम के उस नोटिफिकेशन को चुनौती दी गई थी, जिसके अनुसार 8 मई 2026 के बाद एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग बंद कर दी जाएगी।

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याचिकाकर्ता का कहना था कि एन्क्रिप्शन हटाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले निजता के अधिकार का उल्लंघन है। उनका तर्क था कि एन्क्रिप्शन खत्म होने से निजी संदेशों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।

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केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुनील कुमार जैन ने अदालत में कहा कि यह मामला जनहित याचिका के रूप में सुनवाई योग्य नहीं है।

उन्होंने दलील दी कि संसद द्वारा बनाए गए डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के तहत एक वैधानिक संस्था डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड पहले से मौजूद है, और याचिकाकर्ता को पहले वहीं जाना चाहिए था।

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न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने केंद्र की दलील से सहमति जताई।

पीठ ने कहा कि जब इस तरह के मामलों को सुनने के लिए विशेष वैधानिक मंच उपलब्ध है, तो हाईकोर्ट को सीधे हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अदालत ने निजता से जुड़े मुख्य मुद्दों पर कोई टिप्पणी किए बिना सिर्फ प्रक्रियात्मक पहलू पर निर्णय दिया।

अदालत ने याचिकाकर्ता को सात दिनों के भीतर डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड के समक्ष प्रतिनिधित्व दाखिल करने का निर्देश दिया।

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पीठ ने आगे कहा,

“यदि याचिकाकर्ता प्रतिनिधित्व दाखिल करता है, तो बोर्ड 15 दिनों के भीतर, सुनवाई का अवसर देकर, कानून के अनुसार कारणयुक्त आदेश पारित करे।”

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 6 मई तय की है और निर्देश दिया कि उस तारीख तक बोर्ड का निर्णय अदालत के सामने रखा जाए।

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