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NSA निरोध पर बड़ा सवाल: क्या डीएम के पास सुनवाई का अधिकार? मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मामला बड़ी पीठ को सौंपा

Shivam
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने NSA निरोध मामलों में DM की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह मुद्दा बड़ी पीठ को भेजा कि अभ्यावेदन पर विचार का अधिकार किसके पास है। - विकास तिवारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य

NSA निरोध पर बड़ा सवाल: क्या डीएम के पास सुनवाई का अधिकार? मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मामला बड़ी पीठ को सौंपा

ग्वालियर खंडपीठ में हुई सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत निरोध आदेशों को लेकर एक अहम कानूनी सवाल उठाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि क्या जिला मजिस्ट्रेट (DM) के पास बंदी की अभ्यावेदन (representation) सुनने का अधिकार है या यह अधिकार केवल राज्य सरकार के पास ही है।

यह मामला विकास तिवारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता ने अपने निरोध आदेश को चुनौती दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता विकास तिवारी, जिला विदिशा का निवासी है। 20 अक्टूबर 2025 को उसके खिलाफ विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज हुआ, जिसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने 4 नवंबर 2025 को NSA के तहत तीन महीने के लिए निरोध आदेश जारी किया।

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बाद में 4 फरवरी 2026 को इस निरोध को आगे बढ़ा दिया गया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि निरोध आदेश में यह नहीं बताया गया कि वह DM के समक्ष भी अभ्यावेदन दे सकता है, जिससे उसके संवैधानिक अधिकार प्रभावित हुए।

याचिकाकर्ता के वकीलों ने अदालत में कहा कि:

• जिला मजिस्ट्रेट ही प्रारंभिक निरोध आदेश पारित करने वाला प्राधिकारी है।

• कानून के तहत वह आदेश को रद्द (revocation) भी कर सकता है।

• इसलिए, बंदी को यह जानकारी दी जानी चाहिए थी कि वह DM के समक्ष भी अभ्यावेदन प्रस्तुत कर सकता है।

उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय कमलेशकुमार ईश्वरदास पटेल और अन्य मामलों का हवाला देते हुए कहा कि यह प्रक्रिया का उल्लंघन है।

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राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने इसका विरोध करते हुए कहा:

• NSA के तहत DM द्वारा पारित आदेश 12 दिनों के भीतर राज्य सरकार की स्वीकृति पर निर्भर करता है।

• स्वीकृति के बाद, वास्तविक “निरोध प्राधिकारी” राज्य सरकार बन जाती है।

• इसलिए, अभ्यावेदन का अधिकार केवल राज्य सरकार के समक्ष ही लागू होता है, न कि DM के समक्ष।

पीठ ने विस्तार से NSA की धाराओं और संवैधानिक प्रावधानों का विश्लेषण किया।

अदालत ने कहा:

“राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम की संरचना यह संकेत देती है कि अभ्यावेदन पर विचार करने का अधिकार ‘उचित सरकार’ के पास है, न कि जिला मजिस्ट्रेट के पास।”

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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि:

• DM की भूमिका सीमित समय तक ही रहती है।

• राज्य सरकार की स्वीकृति के बाद DM “functus officio” (अर्थात उसका अधिकार समाप्त) हो जाता है।

• ऐसे में DM के समक्ष अभ्यावेदन एक प्रभावी उपाय नहीं माना जा सकता।

अदालत ने पाया कि इस मुद्दे पर कानून पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इसलिए निम्नलिखित प्रश्न बड़ी पीठ को भेजे गए:

• क्या DM के पास अभ्यावेदन सुनने का अधिकार है?

• क्या पूर्व के फैसलों में इस मुद्दे की सही व्याख्या हुई है?

• क्या केवल राज्य सरकार ही अभ्यावेदन पर विचार कर सकती है?

• यदि DM का विकल्प नहीं बताया गया, तो क्या इससे निरोध आदेश अवैध हो जाता है?

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अदालत ने मामले को अंतिम रूप से तय करने के बजाय इसे बड़ी पीठ (Larger Bench) को संदर्भित कर दिया।

साथ ही, याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी गई कि वह:

• बड़ी पीठ के समक्ष उचित आवेदन प्रस्तुत करे, या

• कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपाय अपनाए।

कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए ताकि बड़ी पीठ का गठन किया जा सके।

Case Details

Case Title: Vikas Tiwari vs State of Madhya Pradesh & Others

Case Number: WP No. 327/2026

Court: High Court of Madhya Pradesh (Gwalior Bench)

Judges: Justice Anand Pathak & Justice Pushpendra Yadav

Decision Date: 31 March 2026

Counsels:

• For Petitioner: Somnath Seth, Sushil Goswami

• For State: Vivek Khedkar (AAG), Ravindra Dixit

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