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मद्रास उच्च न्यायालय ने अदालत कक्ष में कथित व्यवधान के मामले में मदुरै के वकीलों के खिलाफ कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया।

Shivam
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मद्रास हाईकोर्ट ने मदुरै के वकीलों और बार पदाधिकारियों के खिलाफ न्यायिक कार्यवाही में कथित हस्तक्षेप मामले में जारी शो कॉज नोटिस रद्द करने से इनकार कर दिया। - एस. राजमोहन बनाम न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या V, मदुरै और संबंधित मामले

मद्रास उच्च न्यायालय ने अदालत कक्ष में कथित व्यवधान के मामले में मदुरै के वकीलों के खिलाफ कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया।

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने न्यायिक कार्यवाही में कथित हस्तक्षेप और अदालत की कार्यवाही बाधित करने के आरोपों से जुड़े मामले में दायर कई आपराधिक मूल याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि इस स्तर पर कार्यवाही रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता और संबंधित मजिस्ट्रेट द्वारा जारी शो कॉज नोटिस कानून के अनुरूप प्रतीत होते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला 19 और 20 जनवरी 2026 को मदुरै की न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-V की अदालत में हुई घटनाओं से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं में कई अधिवक्ता और बार एसोसिएशन के पदाधिकारी शामिल थे।

रिकॉर्ड के अनुसार, 19 जनवरी को एक अधिवक्ता ने बीएनएसएस की धारा 100 के तहत कथित अवैध हिरासत को लेकर याचिका दायर की थी। अगले दिन जब उसी व्यक्ति को पुलिस ने रिमांड के लिए अदालत में पेश किया, तब अदालत कक्ष में मौजूद कुछ अधिवक्ताओं ने कथित रूप से कार्यवाही में हस्तक्षेप किया और रिमांड आदेश न देने का आग्रह किया।

न्यायिक मजिस्ट्रेट ने आरोप लगाया कि अदालत की कार्यवाही के दौरान सामूहिक रूप से दबाव बनाने की कोशिश की गई, जिसके चलते उन्हें कुछ समय के लिए अदालत कक्ष छोड़ना पड़ा।

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याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति के हैं। उनका कहना था कि किसी भी अधिवक्ता द्वारा जानबूझकर अदालत का अपमान या कार्यवाही बाधित नहीं की गई।

सीनियर काउंसल ने अदालत में कहा कि पूरा विवाद “बार और बेंच के बीच गलतफहमी” का परिणाम है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सीसीटीवी फुटेज में कोई आक्रामक या धमकीपूर्ण व्यवहार दिखाई नहीं देता।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि बीएनएसएस की धारा 384 के तहत आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और शो कॉज नोटिस अगले दिन जारी किए गए, इसलिए पूरी कार्यवाही अवैध है।

न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी ने कहा कि बार और बेंच न्याय प्रणाली के “साझेदार” हैं और दोनों पर संस्था की गरिमा बनाए रखने की जिम्मेदारी है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा,

“एक अधिवक्ता निडर हो सकता है, लेकिन असंयमित नहीं; वह दृढ़ हो सकता है, पर दबाव बनाने वाला नहीं।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी न्यायिक कार्यवाही के दौरान अदालत के समक्ष व्यवधान या हस्तक्षेप का आरोप लगाया जाता है, तो ऐसे मामलों में अदालत को तत्काल कार्रवाई करने का अधिकार है।

न्यायालय ने माना कि रिकॉर्ड, शो कॉज नोटिस और मजिस्ट्रेट के बयान को देखने पर प्रथम दृष्टया मामला बनता है। अदालत ने कहा कि इस स्तर पर तथ्यों की विस्तृत जांच करना उचित नहीं होगा।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि धारा 384 के तहत संज्ञान उसी दिन अदालत उठने से पहले लिया जाना चाहिए था। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि “कोर्ट उठना” केवल कार्यालय समय समाप्त होने तक सीमित नहीं है।

अदालत ने कहा कि न्यायिक कार्य कई बार निर्धारित समय के बाद भी चलता है और यदि मजिस्ट्रेट ने उसी दिन संज्ञान लिया, तो केवल अगले दिन नोटिस जारी होने से कार्यवाही अवैध नहीं हो जाती।

हाईकोर्ट ने सभी आपराधिक मूल याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि कार्यवाही अभी प्रारंभिक चरण में है और याचिकाकर्ताओं को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलेगा।

अदालत ने माना कि इस स्तर पर हस्तक्षेप करना उचित नहीं है और न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा शुरू की गई कार्यवाही जारी रहेगी।

Case Details:

Case Title: S. Rajmohan v. The Judicial Magistrate No. V, Madurai & connected matters

Case Number: Crl.O.P.(MD) Nos.1514, 1617, 1623, 1624 & 4711 of 2026

Judge: Justice L. Victoria Gowri

Decision Date: April 30, 2026

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