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योग्यता के आधार पर नहीं, निष्ठा के आधार पर नियुक्तियाँ: मद्रास उच्च न्यायालय ने राज्य के विधि अधिकारी चयन की आलोचना की

Shivam
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मद्रास हाईकोर्ट ने SC/ST मामले में दोषी को सज़ा निलंबन देने से इनकार किया और सरकारी वकीलों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। - राजकुमार बनाम तमिलनाडु राज्य और अन्य।

योग्यता के आधार पर नहीं, निष्ठा के आधार पर नियुक्तियाँ: मद्रास उच्च न्यायालय ने राज्य के विधि अधिकारी चयन की आलोचना की

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने एक गंभीर आपराधिक मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को सज़ा से अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने न केवल आरोपों की गंभीरता को रेखांकित किया, बल्कि सरकारी वकीलों की नियुक्ति और उनके कामकाज पर भी कड़ी टिप्पणी की।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला राजकुमार बनाम राज्य तमिलनाडु से जुड़ा है। आरोपी पर एक अनुसूचित जाति की महिला के साथ बलात्कार के प्रयास का आरोप था। ट्रायल कोर्ट ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376/511 और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दोषी ठहराते हुए सज़ा सुनाई थी।

घटना 4 नवंबर 2019 की सुबह की है, जब पीड़िता खुले में शौच के लिए गई थी। आरोप है कि आरोपी ने उसे पकड़कर जमीन पर गिराया और दुष्कर्म का प्रयास किया। शिकायत तुरंत दर्ज हुई और उसी दिन मेडिकल जांच भी कराई गई।

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दोषसिद्धि के खिलाफ अपील लंबित होने के दौरान आरोपी ने सज़ा निलंबन (suspension of sentence) की मांग की।

बचाव पक्ष का कहना था कि आरोप झूठे हैं और पीड़िता को कोई चोट नहीं आई। साथ ही, व्यक्तिगत दुश्मनी का हवाला भी दिया गया।

वहीं, राज्य की ओर से पेश सरकारी वकील ने अदालत को मेडिकल रिकॉर्ड की जानकारी दी, जिसमें पीड़िता को चोटें होने की बात दर्ज थी जैसे होंठ पर खरोंच, गर्दन पर नाखून के निशान और अन्य चोटें।

न्यायमूर्ति बी. पुगलेंधी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सख्त रुख अपनाया।

अदालत ने कहा,

“ऐसे मामलों में सज़ा निलंबन का अधिकार विवेकपूर्ण तरीके से इस्तेमाल किया जाना चाहिए, खासकर जब आरोप एक कमजोर वर्ग की महिला से जुड़े हों।”

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साथ ही, अदालत ने यह भी नोट किया कि ट्रायल के दौरान एक अहम दस्तावेज एक्सीडेंट रजिस्टर को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे अभियोजन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हुए।

हाईकोर्ट ने इस मामले को उदाहरण बनाते हुए कहा कि कई बार सरकारी वकीलों की नियुक्ति योग्यता के बजाय राजनीतिक आधार पर होती है, जिससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है।

अदालत ने कहा,

“राज्य का कर्तव्य है कि वह पीड़ितों की ओर से प्रभावी ढंग से मुकदमा लड़े, लेकिन यहां यह जिम्मेदारी पूरी होती नहीं दिखी।”

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डायरेक्टर ऑफ प्रॉसिक्यूशन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए अदालत ने बताया कि संबंधित सरकारी वकील के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है, लेकिन सरकार ने अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया।

सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आरोपी की सज़ा निलंबन की याचिका खारिज कर दी।

साथ ही, अदालत ने थैनी के जिला कलेक्टर और गृह विभाग के सचिव को स्वतः पक्षकार बनाते हुए निर्देश दिया कि सरकारी वकील के खिलाफ लंबित कार्रवाई पर चार सप्ताह के भीतर निर्णय लिया जाए।

Case Details

Case Title: Rajkumar vs State of Tamil Nadu & Ors.

Case Number: Crl.M.P (MD) No.12468 of 2025 in Crl.A (MD) No.405 of 2025

Judge: Justice B. Pugalendhi

Decision Date: 01 April 2026

Counsels:

• For Petitioner: Mr. S. Ramanathan

• For Respondents: Mr. A.S.Abul Kalaam Azad (Govt. Advocate), Mr. R. Karunanidhi

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